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Embroidered artwork for इरियावही प्रायश्चित्त: Embroidered Jain ahimsa palm with a gold wheel, white marble temples and lotuses at dawn

इरियावही प्रायश्चित्त

इरियावही प्रायश्चित्त

जैन साधुओं की दैनिक प्रार्थना जिसमें वे पृथ्वी, जल, बीज, पत्तों, कीड़े-मकोड़ों और अन्य एक-इंद्रिय से लेकर पाँच-इंद्रिय जीवों को चलते-फिरते अनजाने में हुई हिंसा के लिए क्षमा माँगते हैं।

श्लोक

इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! इरियावहियं पडिक्कमामि इच्छं
Ichha kaarein sandisah Bhagavan! Iriya vahiyam padikkamami ichchham.

श्लोक 1

इच्छामि पडिक्कमिउं इरियावहियाए विराहणाए गमणागमणे
Ichchhami padikkamiun iriya vahiyae virahanae gamanagmane.

श्लोक 2

पाणक्कमणे, बीयक्कमणे, हरियक्कमणे, ओसा उत्तिंग-पणग दगमट्टी-मक्कड़ा-संताणा-संकमणे
Panak kamane, biyak kamane, hariyak kamane, osa utting-panag dag matti-makkara-santana-sankamane.

श्लोक 3

जे मे जीवा विराहिया
Je me jeeva virahiya.

श्लोक 4

एगिंदिया, बेइंदिया, तेइंदिया, चउरिंदिया, पंचिंदिया अभिहया, वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघट्टिया, परियाविया, किलामिया, उद्दविया, ठाणाओ ठाणं संकामिया जीवियाओ ववरोविया तस्स मिच्छामि दुक्कड़म्
Egindiya, beindiya, teindiya, chauri ndiya, panchindiya. Abhihaya, vattiya, lesiya, sanghaiya, sanghattiya, pariyaviya, kilamiya, uddaviya, thanao than sankamiya jeeviyao vavaroviya tass michchhami dukkadam.

श्लोक 5

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

इरियावहिया (संस्कृत: ईर्यापथिकी) जैन परंपरा का प्रायश्चित्त-पाठ है, जिसे साधु-साध्वी और श्रावक चलने-फिरने में अनजाने में हुई जीव-हिंसा की क्षमा-याचना के लिए पढ़ते हैं। यह श्वेतांबर परंपरा की आवश्यक विधि का भाग है: इसे पहले आवश्यक सामायिक (आवश्यक क्रमांक 1) के आसपास और आवश्यक सूत्र के छह दैनिक आवश्यकों में चौथे आवश्यक प्रतिक्रमण (क्रमांक 4) के भीतर पढ़ा जाता है। पाठ में एक-इंद्रिय से पंचेंद्रिय तक उन जीवों का क्रम से उल्लेख है जो चलते समय दब या कुचल गए हों, और अंत में 'मिच्छामि दुक्कडं' के साथ अहिंसा के सिद्धांत की अभिव्यक्ति है।

क्या आप जानते हैं?

स्रोत

यह प्रार्थना जैन धर्म के आवश्यक सूत्रों में से एक 'इरियावही सूत्र' का हिस्सा है, जिसे साधु-साध्वी प्रतिदिन अपनी गतिविधियों की शुद्धि के लिए पढ़ते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य चलने-फिरने के दौरान अनजाने में हुए पापों की क्षमा माँगना है।

भाषा

यह प्रार्थना प्राकृत भाषा में है, जो पालि के समान एक प्राचीन भारतीय भाषा है। इसे आम जनता की भाषा समझा जाता था, ताकि यह संस्कृत की तरह केवल पंडितों तक सीमित न रहे।

जीवों के प्रकार

इसमें जीवों को इंद्रियों (ज्ञानेंद्रियों) की संख्या के आधार पर पाँच श्रेणियों में बाँटा गया है—एक से लेकर पाँच इंद्रियों वाले। यह जैन दर्शन की एक अनूठी अवधारणा है, जो सभी प्राणियों को समान रूप से सम्मान देती है।

क्षमा का भाव

'मिच्छामि दुक्कड़म्' वाक्य का अर्थ है 'मेरा किया हुआ पाप मिथ्या हो' या 'मैं उसके लिए क्षमा चाहता हूँ'। यह एक गहन आत्म-निरीक्षण और विनम्रता का प्रतीक है, जिसमें व्यक्ति बिना किसी बहाने के अपनी गलतियों को स्वीकार करता है।

विभिन्न पीड़ाएँ

सूत्र में उल्लिखित शब्द जैसे 'अभिहया' (मारना), 'संघाइया' (कुचलना), और 'परियाविया' (पीड़ा देना) दर्शाते हैं कि यह प्रार्थना केवल बड़े जीवों तक सीमित नहीं है, बल्कि सूक्ष्म से सूक्ष्म प्राणियों तक के प्रति संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाती है।

दैनिक अभ्यास

'इरियावहिया' शब्द संस्कृत 'ईर्यापथिकी' से जुड़ा है; ईर्या का अर्थ चलना-गमन और पथ का अर्थ मार्ग है, यानी मार्ग पर चलने में हुए दोष। इसे चलने के बाद, सामायिक से पहले और प्रतिक्रमण में पढ़ा जाता है, जिससे साधारण चलना भी सजग प्रायश्चित्त बन जाता है।

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