यह प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ की स्तुति में रचा गया 48 श्लोकों का प्रसिद्ध जैन स्तोत्र है, जो आचार्य मानतुंग से जुड़ा है और रक्षा तथा आध्यात्मिक आशीर्वाद के लिए पढ़ा जाता है।