मूल मंत्र (प्रारंभिक श्लोक)
यह सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब का प्रारंभिक श्लोक है, जिसमें परमात्मा के एक, सत्य, निर्भय, निर्वैर, अकाल, अजन्मा और स्वयंभू स्वरूप का वर्णन है।
श्लोक
एक परमात्मा है, सत्य नाम, कर्ता पुरुष, निर्भय, निर्वैर, अकाल मूर्ति, अजन्मा, स्वयंभू—गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह श्लोक गुरु नानक देव जी द्वारा रचित जपुजी साहिब का पहला भाग है, जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। इसे सिख धर्म के दैनिक पाठ (नितनेम) में सुबह के समय गाया जाता है, और यह अनेक सिख प्रार्थनाओं और अनुष्ठानों की शुरुआत में पढ़ा जाता है। इसका गहरा आध्यात्मिक महत्व है और यह सिखों के लिए ईश्वर के मूल गुणों का स्मरण कराता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Guru Nanak Dev Ji · सिख गुरु (प्रथम) · 1469–1539 ईस्वी, पंजाब
सिख धर्म के संस्थापक एवं दस सिख गुरुओं में प्रथम, तलवंडी (वर्तमान ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में जन्मे। उन्होंने ईश्वर की एकता एवं समस्त मनुष्यों की समानता का संदेश फैलाने हेतु दक्षिण एशिया एवं उससे परे लंबी यात्राएं (उदासियां) कीं, तथा उनकी वाणी बाद में गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित की गई।
Guru Nanak Dev Ji की अन्य रचनाएं
क्या आप जानते हैं?
यह गुरु ग्रंथ साहिब की पहली पंक्ति है
इसे 'मूल मंत्र' कहा जाता है, जो सिख धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत मंत्रों में से एक है। यह १४३० पन्नों के पूरे ग्रंथ का सार माना जाता है।
'ੴ' का अर्थ है 'एक ईश्वर'
यह चिन्ह 'एक ओंकार' कहलाता है और इसमें अंक '1' और 'ओंकार' का संयोजन है। इसका सीधा अर्थ है कि ईश्वर एक है, अद्वितीय है, और उसके अलावा कोई दूसरा नहीं।
ईश्वर के गुणों का संकलन
इस पंक्ति में ईश्वर के ८ गुण बताए गए हैं – वह सत्य है, कर्ता है, निर्भय है, निर्वैर है, अकाल है, अजन्मा है, स्वयंभू है, और गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हर शब्द में गहरा दार्शनिक अर्थ छिपा है।
'ਸਤਿ ਨਾਮੁ' का अर्थ
इसका अर्थ है कि उसका नाम ही सत्य है, यानी परमात्मा का अस्तित्व सनातन और अपरिवर्तनीय है। यह सिख धर्म में सत्य पर जोर देता है।
'ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ' – समय से परे
इस शब्द का अर्थ है 'जो मृत्यु के अधीन नहीं', अर्थात् ईश्वर न कभी पैदा होता है और न मरता है। वह कालातीत है।
'ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ' का महत्व
अंतिम शब्द बताते हैं कि ईश्वर को गुरु (आध्यात्मिक गुरु या गुरु ग्रंथ साहिब) की कृपा से ही जाना जा सकता है। यह सिख धर्म में गुरु-शिष्य परंपरा की केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।
Guru Nanak Dev Ji
सिख धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
