राखे राखणहार
यह एक सिख प्रार्थना है जो ईश्वर की रक्षा और कृपा की स्तुति करती है। इसमें भक्तों को संतों की संगति में संसार-समुद्र से पार उतारने और दुष्टों का नाश करने की प्रार्थना की गई है।
श्लोक
रक्षक प्रभु स्वयं ही रक्षा करते और बचाते हैं; गुरु के चरणों में लगाकर हमारे कार्य सँवार देते हैं।
श्लोक 1
वह दयालु होकर आते हैं और मन से कभी नहीं भूलते; साधु संतों की संगति में भवसागर से पार उतारते हैं।
श्लोक 2
नास्तिकों, निंदकों और दुष्टों को क्षण भर में नष्ट कर देते हैं; हे नानक, उस स्वामी का सहारा मन में धारण करो।
श्लोक 3
सदा-सदा दाता प्रभु का उन्होंने ध्यान किया; भक्तों के साथ मिलकर प्रभु ने उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा की।
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह पाठ गुरु ग्रंथ साहिब से लिया गया है, जिसकी रचना गुरु अर्जन देव जी ने की थी। यह सिखों की संध्या प्रार्थना (रेहरास साहिब) का एक भाग है, जिसे प्रतिदिन पढ़ा जाता है। इसमें ईश्वर की सर्वोच्च शक्ति और दयालुता का वर्णन है, और यह माना जाता है कि इसके पाठ से भक्तों को मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा मिलती है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Guru Arjan Dev Ji · सिख गुरु (पंचम) · 1563–1606 ईस्वी, पंजाब
पंचम सिख गुरु, जिन्होंने 1604 में आदि ग्रंथ (जो बाद में गुरु ग्रंथ साहिब का मूल बना) का संकलन करते हुए पूर्ववर्ती गुरुओं एवं विभिन्न भगतों की वाणी एकत्र की। उन्होंने आंतरिक शांति पर एक दीर्घ स्तवन, सुखमनी साहिब, की भी रचना की, तथा अमृतसर में स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) के निर्माण की देखरेख की।
क्या आप जानते हैं?
लेखक और राग
यह शबद गुरु अर्जन देव जी द्वारा रचित है, जो सिखों के पाँचवें गुरु हैं। यह श्री गुरु ग्रंथ साहिब में राग गौरी में दर्ज है, जो एक गंभीर और भक्तिपूर्ण राग है, जो समर्पण और श्रद्धा के भाव को उजागर करता है।
विषय
इस शबद का मुख्य विषय ईश्वरीय संरक्षण है। इसमें वर्णन है कि कैसे प्रभु स्वयं अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, उन्हें गुरु के चरणों में लगाकर उनके कार्य सफल करते हैं, और दुष्टों का नाश करते हैं।
प्रमुख शब्द
"गुर की पैरी पाइ" का अर्थ है गुरु के चरणों में समर्पण करना, जो सिख धर्म में पूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक है। "भवजल" संसार रूपी समुद्र है, जिससे साधु संगति में पार उतरा जाता है। "साकत" उन लोगों को कहा जाता है जो ईश्वर से विमुख हैं।
महत्व
यह शबद सिख धर्म में अत्यंत लोकप्रिय है और प्रायः कठिनाइयों और संकटों से बचने के लिए पढ़ा जाता है। इसमें प्रभु की शरण लेने और गुरु के मार्गदर्शन में चलने पर बल दिया गया है।
संरचना
इस शबद में चार पद हैं, प्रत्येक में दो पंक्तियाँ हैं। अंतिम पंक्ति में "नानक" शब्द आता है, जो गुरु की हस्ताक्षर-शैली है, जो दर्शाता है कि यह गुरु की वाणी है।
Guru Arjan Dev Ji
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