श्री गुरु ग्रंथ साहिब एवं दशम ग्रंथ के चुनिंदा शबद
यह संग्रह श्री गुरु ग्रंथ साहिब और दशम ग्रंथ से लिए गए विभिन्न प्रकार के भजनों और प्रार्थनाओं का समूह है, जो ईश्वर की स्तुति, उनके गुणों का गान, और उनकी शरण की विनती करते हैं।
श्लोक
हरि युगों-युगों से भक्तों को उत्पन्न करते आए हैं और अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करते आए हैं। उन्होंने दुष्ट हिरण्यकश्यप को मारा और प्रह्लाद को तारा। अहंकारियों और निंदकों को पीठ दिखाई, और नामदेव को मुख से लगाया। हे नानक! ऐसे हरि की सेवा करने पर वे अंत में छुड़ा लेते हैं। ॥४॥१३॥२०॥
श्लोक 1
हे कर्ता! दुख औषधि है और सुख रोग हो गया। जब सुख होता है, तब उसका नाश नहीं होता। तू करने वाला है, मैं कुछ नहीं; जब मैं करता हूँ, तब कुछ नहीं होता। ॥१॥
श्लोक 2
मैं आपकी कुदरत पर बलिहारी हूँ, जिसमें आप व्याप्त हैं। आपका अंत नहीं जाना जा सकता। ॥१॥ रहाउ॥
श्लोक 3
जाति में ज्योति और ज्योति में जाति है, आप अकल और कला से परिपूर्ण हैं। तू सच्चा साहिब है, तेरी सिफत सुंदर है; जिसने इसे की, वह पार उतर गया। हे नानक! कर्ता की बातें कहो; जो कुछ करना है, वह कर ही रहा है। ॥२॥
श्लोक 4
सो दर, राग आसा, महला 1, एक ओंकार, सतगुरु की कृपा से॥
श्लोक 5
वह तेरा दर कैसा है? वह घर कैसा है, जिसमें बैठकर तू सबको संभालता है? तेरे नाद अनेक और असंख्य बजते हैं; तेरे बजाने वाले कितने हैं। तेरे कितने राग हैं, जो प्रियाओं के साथ कहे जाते हैं; तेरे गाने वाले कितने हैं। तुझे पवन, जल, अग्नि गाते हैं; राजा धर्म तेरे द्वार पर गाता है। तुझे चित्रगुप्त गाते हैं, जो लिखकर जानते हैं; लिख-लिखकर धर्म का विचार करते हैं। ॥
श्लोक 6
तुझे शिव, ब्रह्मा और देवियाँ गाते हैं, जो तेरी शोभा से सदा सजे हैं। तुझे इंद्र गाते हैं, जो अपने सिंहासन पर बैठे हैं; देवताओं के साथ तेरे दर पर हैं। तुझे सिद्ध समाधि में गाते हैं; तुझे साधु विचार में गाते हैं। तुझे जती, सती, संतोषी गाते हैं; तुझे वीर योद्धा गाते हैं। तुझे पंडित गाते हैं, जो पढ़ते हैं और ऋषि-मुनि, युगों-युगों से वेदों के साथ। ॥
श्लोक 7
तुझे मोहिनियाँ गाती हैं, जो मन को मोहती हैं; स्वर्ग, मछ और पाताल तुझे गाते हैं। तुझे रत्न गाते हैं, जो तूने उत्पन्न किए; अड़सठ तीर्थों के साथ। तुझे महाबली योद्धा और वीर गाते हैं; तुझे चार खानियाँ गाती हैं। तुझे खंड, मंडल और ब्रह्मांड गाते हैं; तूने रच-रचकर उन्हें धारण किया है। ॥
श्लोक 8
वे ही तुझे गाते हैं, जो तुझे भाते हैं; तेरे भक्त रस से भरे हुए हैं। और कितने तुझे गाते हैं, वे मेरे चित्त में नहीं आते; नानक क्या विचार करे? ॥
श्लोक 9
वही वही सदा सच्चा साहिब है; सच्चा है, सच्ची है उसकी महिमा। वह है भी और होगा भी; न जाएगा, न नष्ट होगा; उसी ने यह रचना रची है। ॥
श्लोक 10
उसने रंग-रंग और भाँति-भाँति की जिन्न्सें बनाकर माया उत्पन्न की। उसने अपनी रचना को रच-रचकर देखा; जैसी उसकी महिमा है। जो उसे भाता है, वही करता है; फिर उसका हुकम टाला नहीं जा सकता। वह बादशाह है, शहंशाह है, पातिसाहिब है; हे नानक! उसकी रजा में ही रहना है। ॥१॥
श्लोक 11
आसा महला 1॥ सुनकर सब कोई उसे बड़ा कहता है। पर वह कितना बड़ा है, यह देखा ही जा सकता है? उसकी कीमत नहीं पाई जा सकती, न कही जा सकती। कहने वाले तो तुझमें ही समा गए। ॥१॥
श्लोक 12
हे मेरे साहिब! तू बहुत बड़ा, गहरा और गंभीर है, गुणों से भरा हुआ है। कोई नहीं जानता कि तू कितना और कैसा है। ॥१॥ रहाउ॥
श्लोक 13
सब सुरतियाँ मिलकर सुरति करती हैं; सब कीमतें मिलकर कीमत पाती हैं। ज्ञानी, ध्यानी और गुरु के गुरु हैं; तेरी एक तिल भर महिमा भी नहीं कही जा सकती। ॥२॥
श्लोक 14
सब सत्य, सब तप, सब भलाइयाँ; सिद्ध पुरुषों की बड़ाइयाँ; तुझ बिना किसी ने सिद्धि नहीं पाई। वह तो कर्म से मिलती है, रोकी नहीं जा सकती। ॥३॥
श्लोक 15
कहने वाला क्या कर सकता है? तेरे भंडार सिफतों से भरे हैं। जिसे तू देता है, उसका क्या उपाय? हे नानक! वह सच्चा ही सबको सवारने वाला है। ॥४॥२॥
श्लोक 16
आसा महला 1॥ तुझे आखूँ तो जीवूँ; विसर जाऊँ तो मर जाऊँ। तेरा सच्चा नाम कहना कठिन है। सच्चे नाम की भूख लगती है; उस भूख से खाकर सब दुख दूर हो जाते हैं। ॥१॥
श्लोक 17
वह कैसे विसरे, हे मेरी माँ? वह सच्चा साहिब, सच्चे नाम वाला। ॥१॥ रहाउ॥
श्लोक 18
सच्चे नाम की एक तिल बराबर महिमा है; कहते-कहते थक गए, पर कीमत नहीं पाई। यदि सब मिलकर कहें, तो भी वह न बड़ा होता है, न घटता है। ॥२॥
श्लोक 19
वह न मरता है, न उसका शोक होता है। वह देता ही रहता है, भोग कभी समाप्त नहीं होता। यही उसका गुण है, और कोई नहीं। न कोई हुआ, न कोई होगा। ॥३॥
श्लोक 20
जैसा तू स्वयं है, वैसी ही तेरी दात है। तूने दिन करके रात बनाई। जो खसम को विसारते हैं, वे कमजात हैं। हे नानक! नाम के बिना सब व्यर्थ है। ॥४॥३॥
श्लोक 21
राग गूजरी महला 4॥ हरि के जन, सतगुरु, सत्पुरुषों! मैं गुरु के पास विनती करता हूँ। हम कीड़े-मकोड़े हैं; हे सतगुरु! अपनी शरण में लेकर कृपा करो और नाम प्रकाशित करो। ॥१॥
श्लोक 22
हे मेरे मित्र गुरुदेव! मुझे राम नाम प्रकाशित करो। गुरु की मति से नाम मेरा प्राण-सखा है; हरि की कीर्ति ही मेरी जीविका है। ॥१॥ रहाउ॥
श्लोक 23
हरि के जनों के बड़े भाग्य हैं, जिन्हें हरि-हरि की श्रद्धा और प्यास है। हरि-हरि नाम पाकर वे तृप्त होते हैं; संगति में मिलकर गुण प्रकाशित होते हैं। ॥२॥
श्लोक 24
जिन्होंने हरि-हरि-हरि का रस नाम नहीं पाया, वे भाग्यहीन हैं और यम के पास जाते हैं। जो सतगुरु की शरण और संगति में नहीं आए, उनका जीना धिक्कार है, उनका जीवन धिक्कार है। ॥३॥
श्लोक 25
जिन्होंने हरि जनों और सतगुरु की संगति पाई, उनके माथे पर धुर से लिखा लिखाया गया। धन्य है वह सत्संगति, जिसमें हरि का रस पाया गया; हे जन नानक! मिलकर नाम प्रकाशित हुआ। ॥४॥४॥
श्लोक 26
राग गूजरी महला 5॥ हे मन! तू क्यों उद्योग करता है? जब हरि जी ने तो तेरा आहार पहले ही ठहरा दिया है। पहाड़ों और पत्थरों में भी जीव उत्पन्न किए; उनका रिज़्क आगे करके रख दिया। ॥१॥
श्लोक 27
हे मेरे माधव जी! सत्संगति मिलने पर ही मनुष्य तरता है। गुरु की कृपा से परम पद पाया; सूखी लकड़ी हरी हो गई। ॥१॥ रहाउ॥
श्लोक 28
माता-पिता, लोक, पुत्र, स्त्री; कोई किसी का सहारा नहीं है। ठाकुर प्रत्येक के सिर-सिर का रिज़्क संभालता है; हे मन! तू क्यों भय करता है? ॥२॥
श्लोक 29
पक्षी सैकड़ों कोस उड़कर आता है, और उसके पीछे उसके बच्चे (बिना पंखों के) छोड़े जाते हैं। उन्हें कौन खिलाता है, कौन चुगाता है? मन में सिमरन करो। ॥३॥
श्लोक 30
सब निधान, दसों अष्ट सिद्धियाँ ठाकुर की हथेली पर रखी हैं। हे जन नानक! मैं बलि-बलि जाऊँ, सदा बलि जाऊँ; तेरा पारावार नहीं है। ॥४॥५॥
श्लोक 31
राग आसा महला 4 सो पुरखु, एक ओंकार, सतगुरु की कृपा से॥
श्लोक 32
वह पुरुष निरंजन है, हरि पुरुष निरंजन है; वह अगम, अगाध और अपार है। सब तुझे ध्याते हैं, हे सच्चे सिरजनहार! सब जीव तेरे हैं; तू जीवों का दाता है। हे संतो! उसे ध्याओ, जो सब दुख भुलाने वाला है। हरि स्वयं ठाकुर है, स्वयं सेवक है; हे नानक! जीव तो क्या विचारे? ॥१॥
श्लोक 33
तू घट-घट के अंदर और सबमें व्याप्त है; हे जी! एक ही पुरुष सबमें समाया है। कुछ दाता हैं, कुछ भिखारी; सब तेरे अद्भुत चमत्कार हैं। तू स्वयं दाता है, स्वयं भोक्ता है; मैं तुझ बिना और किसी को नहीं जानता। तू पारब्रह्म है, अनंत-अनंत; तेरे क्या गुण कहूँ? जो तेरी सेवा करते हैं, हे नानक! उन पर मैं कुर्बान हूँ। ॥२॥
श्लोक 34
जो तुझे ध्याते हैं, वे जन युगों में सुखी रहते हैं। वे मुक्त हो गए, जिन्होंने हरि का ध्यान किया; उनकी यम की फाँसी टूट गई। जिन्होंने निर्भय हरि का ध्यान किया, उनका सब भय दूर हो गया। जिन्होंने मेरे हरि की सेवा की, वे हरि-हरि रूप में समा गए। वे धन्य हैं, जिन्होंने हरि का ध्यान किया; हे नानक! उन पर बलि जाओ। ॥३॥
श्लोक 35
तेरी भक्ति के भंडार अपार और अनंत हैं। तेरे भक्त तुझे सलाहते हैं, हे हरि! अनेकों प्रकार से। तेरे अनेक भक्त पूजा करते हैं, तप तपते हैं, अनंत जप करते हैं। तेरे अनेक बहुत स्मृतियाँ और शास्त्र पढ़ते हैं, छह कर्म करते हैं। हे नानक! वे भक्त भले हैं, जो मेरे हरि भगवंत को भाते हैं। ॥४॥
श्लोक 36
तू आदि पुरुष है, अपरंपार कर्ता है; तेरे बराबर और कोई नहीं। तू युगों-युगों से एक है, सदा-सदा तू एक है; तू निश्चल कर्ता है। जो तुझे आप भाता है, वही होता है; तू खुद करता है, वही होता है। तूने स्वयं सारी सृष्टि उपजाई; तूने स्वयं रचकर सबको समेट लिया। जन नानक कर्ता के गुण गाता है, जो सबका जानने वाला है। ॥५॥१॥
श्लोक 37
आसा महला 4॥ तू कर्ता, सच्चा मेरा स्वामी है। जो तुझे भाए, वही होगा; जो तू देता है, वही मैं पाता हूँ। ॥१॥ रहाउ॥
श्लोक 38
सब कुछ तेरा है; तू सबमें ध्याया जाता है। जिस पर कृपा करता है, वह नाम रत्न पाता है। गुरुमुख पाता है, मनमुख खो देता है। तूने स्वयं बिछोड़ा और स्वयं मिलाया। ॥१॥
श्लोक 39
तू दरिया है; सब तुझमें ही हैं। तुझ बिना और कोई नहीं। सब जीव-जंतु तेरा खेल हैं। वियोग में मिलकर बिछुड़े, संयोग से मिलन होता है। ॥२॥
श्लोक 40
जिसे तू जनाता है, वही जन जानता है। वह हरि के गुण सदा कहता और सुनाता है। जिसने हरि की सेवा की, उसने सुख पाया; वह सहज ही हरि नाम में समा गया। ॥३॥
श्लोक 41
तू स्वयं कर्ता है; तेरा किया हुआ सब कुछ होता है। तुझ बिना और कोई नहीं। तू कर-करके देखता और जानता है। हे जन नानक! गुरुमुख से वह प्रकट होता है। ॥४॥२॥
श्लोक 42
आसा महला 1॥ उस सरोवर में निवास करने वाले हुए; उन्होंने पानी और आग बनाई। कमल (मोह) में पैर नहीं चलता; मैं देखता हूँ कि वहाँ वे डूब गए। ॥१॥
श्लोक 43
हे मूर्ख मन! तू एक का भी चिंतन नहीं करता। हरि को भूलने से तेरे गुण गल जाते हैं। ॥१॥ रहाउ॥
श्लोक 44
न मैं जती हूँ, न सती, न पढ़ा हूँ; मूर्ख और मुग्ध ही जन्म हुआ। नानक प्रणाम करता है, उनकी शरण में, जिन्होंने तुझे नहीं भुलाया। ॥२॥३॥
श्लोक 45
आसा महला 5॥ मानव देह मिली है। यह तेरी गोविंद से मिलने की बारी है। तेरे और कामों से कुछ नहीं होता। साधु संगति में मिल और केवल नाम का भजन कर। ॥१॥
श्लोक 46
संसार-सागर से तरने के लिए सामग्री जुटा। माया के रंग में जन्म व्यर्थ जाता है। ॥१॥ रहाउ॥
श्लोक 47
न जप, न तप, न संयम, न धर्म कमाया। न हरि राजा की सेवा जानी। नानक कहते हैं, हम नीच कर्म वाले हैं; तेरी शरण में पड़े हैं, हमारी लाज रख। ॥२॥४॥
श्लोक 48
कब्यो बाच बेनती। चौपाई। हमारी रक्षा करो, हाथ देकर। मन की इच्छा पूर्ण हो। तेरे चरणों में हमारा मन रहे। हमें अपना जानकर पालन करो। ॥३७७॥
श्लोक 49
हमारे सब शत्रुओं को तुम नष्ट करो। अपना हाथ देकर मुझे बचाओ। मेरा परिवार सुखी रहे। हे कर्तार! सब सेवक और शिष्य सुखी रहें। ॥३७८॥
श्लोक 50
मेरी रक्षा अपने हाथ से करो। सब बैरियों को आज समाप्त करो। हमारी आशा पूर्ण हो। तेरे भजन की प्यास बनी रहे। ॥३७९॥
श्लोक 51
तुझे छोड़कर मैं किसी और का ध्यान न करूँ। जो वर मैं चाहता हूँ, वह तुझसे ही पाऊँ। मेरे सेवकों और शिष्यों को तारो। मेरे शत्रुओं को चुन-चुनकर मारो। ॥३८०॥
श्लोक 52
अपना हाथ देकर मुझे बचा लो। मृत्यु के काल का भय दूर करो। सदा मेरे पीछे रहो। हे श्री असिधुज जी! रक्षा करो। ॥३८१॥
श्लोक 53
हे रक्षक! मुझे बचा लो। हे साहिब, संत, प्यारे सहायक! हे दीनबंधु, शत्रुओं के हन्ता! तुम चौदहों लोकों के स्वामी हो। ॥३८२॥
श्लोक 54
काल के अधीन होकर ब्रह्मा ने शरीर धारण किया। काल के अधीन होकर शिव जी अवतरित हुए। काल के अधीन होकर विष्णु प्रकट हुए। सब काल का तमाशा रचा गया। ॥३८३॥
श्लोक 55
जिस काल ने योगी शिव को किया, बेदराज ब्रह्मा जी को किया। जिस काल ने सब लोकों को सवारा, उसको हमारा नमस्कार है। ॥३८४॥
श्लोक 56
जिस काल ने सब जगत बनाया, देव, दैत्य, यक्ष उत्पन्न किए। आदि और अंत में एक ही अवतार है। उसी को हमारा गुरु समझो। ॥३८५॥
श्लोक 57
नमस्कार है उसी को हमारा, जिसने सब प्रजा को आप सवारा। सेवकों को सद्गुण और सुख दिया। शत्रुओं को पल में मार डाला। ॥३८६॥
श्लोक 58
वह घट-घट के अंदर की जानता है। भले-बुरे की पीर पहचानता है। चींटी से लेकर हाथी तक, सब पर कृपा दृष्टि से फूला रहता है। ॥३८७॥
श्लोक 59
संतों के दुख से वह दुखी होता है। साधुओं के सुख से वह सुखी होता है। एक-एक की पीर पहचानता है। घट-घट के पट-पट को जानता है। ॥३८८॥
श्लोक 60
जब तू उत्कर्ष करता है, हे कर्तार! तब प्रजा को अपार देह धारण कराता है। जब तू कभी आकर्ष करता है, तब सब देहधारी तुझमें मिल जाते हैं। ॥३८९॥
श्लोक 61
जितने मुख हैं, सृष्टि में सब धारण करता है। अपनी-अपनी बुद्धि से बोलते हैं। तू सबसे रहित निराला है। वेद, भेद और आलम को जानता है। ॥३९०॥
श्लोक 62
वह निरंकार, निर्विकार, निर्लेप है। आदि, अनिल, अनादि, असंभव है। मूर्ख उसका भेद कहते हैं, जिसका भेद वेद भी नहीं पाते। ॥३९१॥
श्लोक 63
उसे पत्थर मानते हैं। महामूर्ख कुछ भेद नहीं जानते। महादेव को सदा शिव कहते हैं, पर निरंकार का भेद नहीं जानते। ॥३९२॥
श्लोक 64
जितनी अपनी-अपनी बुद्धि है, उतने ही भिन्न-भिन्न रूपों में तेरा वर्णन करते हैं। तेरा विस्तार नहीं जाना जा सकता। किस विधि से पहला संसार रचा? ॥३९३॥
श्लोक 65
एक ही रूप, अनुपम सरूप है। वही रंक बना, वही राजा और भूमिपति बना। उसने अंडज, जेरज, सेतज उत्पन्न किए। फिर उत्भुज खानि रच दी। ॥३९४॥
श्लोक 66
कहीं फूलकर राजा बन बैठा। कहीं सिमटकर संकर एक जैसा हो गया। सारी सृष्टि का अद्भुत रूप दिखाया। वह आदि-जुगादि सरूप, स्वयंभू है। ॥३९५॥
श्लोक 67
अब मेरी रक्षा तुम करो। शिष्यों को बचाओ और अशिष्यों को संहारो। जितने दुष्ट उत्पात उठाते हैं, सब म्लेच्छों को रण में मार डालो। ॥३९६॥
श्लोक 68
जो असिधुज तेरी शरण में पड़ते हैं, उनके दुष्ट दुखी होकर मरते हैं। जो पुरुष तेरे पग पर पड़ता है, उसके सब संकट तुम टालते हो। ॥३९७॥
श्लोक 69
जो कलि में एक बार भी ध्याएगा, उसके समीप काल नहीं आएगा। उसकी सब कालों से रक्षा होगी। दुष्ट और अरिष्ट तुरंत टल जाएंगे। ॥३९८॥
श्लोक 70
जिस पर तू कृपा दृष्टि से देखता है, उसके ताप क्षण में हर लेता है। उसके घर में सब रिद्धि-सिद्धि होती है। कोई दुष्ट उसकी छाया भी नहीं छू सकता। ॥३९९॥
श्लोक 71
जिसने एक बार भी तुम्हें स्मरण किया, उसे काल के फंदे से बचा लिया। जिस मनुष्य ने तेरा नाम कहा, वह दरिद्रता, दुष्टों और दोषों से बच गया। ॥४००॥
श्लोक 72
हे खड़गकेतु! मैं तेरी शरण में हूँ। अपना हाथ देकर मुझे बचा लो। सब स्थानों पर मेरे सहायक बनो। दुष्टों और दोषों से मुझे बचाओ। ॥४०१॥
श्लोक 73
स्वैया। जब से मैंने तेरा पाँव पकड़ा, तब से कोई मुझे आँख तिरछी करके नहीं देख सका। राम, रहीम, पुरान, कुरान अनेक कहते हैं, पर एक मत को नहीं मानते। स्मृति, शास्त्र, वेद सब बहुत भेद कहते हैं, मैं एक भी नहीं जानता। हे श्री असिपान! तुम्हारी कृपा से मैंने जो कहा, वह सब तूने ही कहलाया। ॥८६३॥
श्लोक 74
दोहरा। सब द्वारों को छोड़कर मैंने तेरा द्वार पकड़ा है। हे गोविंद! तेरे दास की बाँह पकड़ने की लाज है। ॥८६४॥
श्लोक 75
रामकली महला 3 अनंदु, एक ओंकार, सतगुरु की कृपा से॥ अनंद हुआ, हे मेरी माँ! मैंने सतगुरु पाया। सतगुरु पाया सहज भाव से, मन में बधाइयाँ बजीं। रत्न रागों के परिवार और प्रियाएँ शब्द गाने आईं। हे भाई! वह शब्द गाओ जो हरि का है, और मन में बसाओ। नानक कहते हैं, अनंद हुआ, मैंने सतगुरु पाया। ॥१॥
श्लोक 76
हे मेरे मन! तू सदा हरि के साथ रह। हरि के साथ रह, हे मेरे मन! सब दुख भूल जाएँगे। वह तेरा स्वीकार करेगा, तेरे सब काम सवारेगा। सब बातों में समर्थ स्वामी है; वह क्यों मन से विसरे? नानक कहते हैं, हे मेरे मन! सदा हरि के साथ रह। ॥२॥
श्लोक 77
हे सच्चे साहिब! तेरे घर में क्या नहीं है? तेरे घर में सब कुछ है; जिसे देता है, वह पाता है। सदा तेरी सिफत-सलाह है, नाम मन में बसाए। जिनके मन में नाम बसा, उनमें अनेक शब्द बजते हैं। नानक कहते हैं, हे सच्चे साहिब! तेरे घर में क्या नहीं है? ॥३॥
श्लोक 78
सच्चा नाम मेरा आधार है। सच्चा नाम मेरा आधार है, जिसने सब भूख मिटा दी। शांति और सुख करके वह मन में आ बसा, जिसने सब इच्छाएँ पूरी कर दीं। मैं सदा गुरु पर कुर्बान हूँ, जिसने ये बड़ाइयाँ दीं। नानक कहते हैं, हे संतो! सुनो, शब्द में प्रेम धारण करो। सच्चा नाम मेरा आधार है। ॥४॥
श्लोक 79
उस भाग्यशाली घर में पाँच शब्द बजते हैं। भाग्यशाली घर में शब्द बजते हैं, जहाँ कला धारण की गई। पाँच दूतों को तूने वश में किया, काल को मार डाला। धुर से जिन्हें कर्म मिला, वे हरि के नाम में लगे। नानक कहते हैं, वहाँ सुख हुआ, उस घर में अनहद बजते हैं। ॥५॥
श्लोक 80
हे बड़भागियों! अनंद सुनो, सब मनोरथ पूरे हुए। पारब्रह्म प्रभु पाया, सब विसूरे उतर गए। दुख, रोग, संताप उतर गए, सच्ची बाणी सुनी गई। संत और सजन प्रसन्न हुए, पूरे गुरु से जाना। सुनने से पवित्र, कहने से पवित्र, सतगुरु सबमें भरपूर है। नानक विनती करता है, गुरु के चरण लगे, अनहद तूरे बजे। ॥४०॥१॥
श्लोक 81
मुंदावणी महला 5॥ थाली में तीन वस्तुएँ रखी गईं: सत्य, संतोष और विचार। उसमें ठाकुर का अमृत नाम रखा, जो सबका आधार है। जो कोई खाए, जो कोई चखे, उसका उद्धार होता है। यह वस्तु छोड़ी नहीं जा सकती; नित-नित इसे हृदय में धारण करो। इस संसार-सागर से चरण लगकर तरो; हे नानक! सब ब्रह्म का विस्तार है। ॥१॥
श्लोक 82
सलोक महला 5॥ तेरा किया हुआ मैं नहीं जानता; तूने मुझे योग्य बनाया। मैं निर्गुण हूँ, मुझमें कोई गुण नहीं; तूने स्वयं दया की। दया हुई, मेहरबानी हुई, सतगुरु सजन मिला। हे नानक! नाम मिले तो जीऊँ, तन-मन हरा हो जाए। ॥१॥
श्लोक 83
पौड़ी॥ वहाँ तू समर्थ है, जहाँ कोई नहीं। वहाँ तेरी रक्षा है, अग्नि के उदर में। सुनकर यम के दूत तेरे नाम से छोड़कर चले जाते हैं। भयानक और अगाध भवसागर से गुरु के शब्द से पार उतरो। जिन्हें प्यास लगी, वे अमृत पीते हैं। कलियुग में यही पुण्य है कि गोविंद के गुण गाओ। वह सब पर कृपालु है; प्रत्येक साँस को संभालता है। कोई व्यर्थ नहीं जाता, जो तुझसे आता है। ॥९॥
श्लोक 84
राग गूजरी वार महला 5, एक ओंकार, सतगुरु की कृपा से॥ सलोक मः 5॥ अंदर में गुरु का आराधन करना, जीभ से गुरु का नाम जपना। नेत्रों से सतगुरु को देखना, कानों से गुरु का नाम सुनना। सतगुरु से रंगे हुए को दरगाह में स्थान मिलता है। नानक कहते हैं, जिस पर कृपा करता है, वह यह वस्तु देता है। जग में उत्तम कहलाते हैं, विरले ही होते हैं। ॥१॥
श्लोक 85
मः 5॥ रक्षक ने स्वयं रखकर बचा लिया। गुरु की पैरों में डालकर काम सवार दिए। वह स्वयं दयालु हुआ, मन से नहीं विसारा। साधु जनों की संगति में भवसागर से तार दिया। साकतों, निंदकों और दुष्टों को क्षण में नष्ट कर दिया। उस साहिब का सहारा नानक के मन में है। जिसे स्मरण करने से सुख होता है, सब दुख दूर हो जाते हैं। ॥२॥
श्लोक 86
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
ये पद सिख धर्म के पवित्र ग्रंथों से लिए गए हैं। श्री गुरु ग्रंथ साहिब सिखों का मुख्य धार्मिक ग्रंथ है, जिसमें विभिन्न गुरुओं और संतों की वाणी संकलित है। दशम ग्रंथ दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़ा ग्रंथ है। इनमें से अनेक शबद (भजन) सिखों की दैनिक प्रार्थना और सत्संग में गाए जाते हैं। इनका उपयोग ध्यान, प्रार्थना और आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया जाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Guru Nanak Dev Ji · सिख गुरु (प्रथम) · 1469–1539 ईस्वी, पंजाब
सिख धर्म के संस्थापक एवं दस सिख गुरुओं में प्रथम, तलवंडी (वर्तमान ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में जन्मे। उन्होंने ईश्वर की एकता एवं समस्त मनुष्यों की समानता का संदेश फैलाने हेतु दक्षिण एशिया एवं उससे परे लंबी यात्राएं (उदासियां) कीं, तथा उनकी वाणी बाद में गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित की गई।
Guru Nanak Dev Ji की अन्य रचनाएं
क्या आप जानते हैं?
रचियता
इस संग्रह में गुरु ग्रंथ साहिब के चार गुरुओं—गुरु नानक (महला 1), गुरु अमर दास (महला 3), गुरु राम दास (महला 4) और गुरु अर्जन (महला 5)—के साथ गुरु गोबिंद सिंह की 'चौपाई' (दशम ग्रंथ से) भी शामिल है। यह सिख धर्म के विभिन्न कालखंडों की वाणी को एक साथ प्रस्तुत करता है।
राग विविधता
यहाँ तीन रागों—आसा, गूजरी और रामकली—का प्रयोग हुआ है। हर राग की अपनी भावनात्मक गहराई है: आसा सुबह का राग है जो आशा और प्रार्थना का भाव देता है, गूजरी करुणा और समर्पण को उजागर करता है, और रामकली आनंद व उल्लास का राग है।
प्रमुख विषय
समस्त वाणी में ईश्वर की सर्वव्यापकता, उसकी महिमा का बखान और गुरु की शरण में जाने का संदेश प्रमुख है। 'सो पुरखु' शब्द (महला 4) ईश्वर को निरंजन, अपार और अगम बताता है जबकि 'आखा जीवा' (महला 1) कहता है कि केवल नाम स्मरण से ही जीवन सार्थक है।
चौपाई का ऐतिहासिक महत्व
गुरु गोबिंद सिंह की चौपाई (श्लोक 48-74) सिखों की दैनिक प्रार्थना 'बेंती चौपाई' का हिस्सा है। यह युद्ध और कठिनाई के समय रक्षा के लिए लिखी गई थी और आज भी हर सिख इसे 'खड़गकेतु' के रूप में नित्य पढ़ता है।
मुंदावणी की अनूठी शिक्षा
अंत में आने वाली 'मुंदावणी' (महला 5) तीन गुणों—सत्य, संतोष और सही विचार—को अमृत नाम के साथ रखने का सुझाव देती है। यह सिख धर्म के सार को एक थाली में सजाकर प्रस्तुत करती है: नाम ही सबका आधार है।
गुरु की महिमा
बार-बार 'सतिगुरु' को ही सच्चा मार्गदर्शक बताया गया है। 'ਅਨੰਦੁ ਭਇਆ' (रामकली महला 3) में गुरु के मिलने पर आनंद और सब दुखों के दूर होने का वर्णन है। 'ਰਖੇ ਰਖਣਹਾਰਿ' (महला 5) में गुरु की शरण में ही रक्षा और कल्याण बताया गया है।
Guru Nanak Dev Ji
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