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Embroidered artwork for कबियोबाच बेनती चौपाई: Embroidered Khanda emblem with a saffron Nishan Sahib flag and marigolds at sunrise

कबियोबाच बेनती चौपाई

कबियोबाच बेनती चौपाई

यह एक प्रार्थना है जिसमें भक्त भगवान से अपने हाथ की रक्षा और सभी बाधाओं को दूर करने की याचना करता है।

श्लोक

कबियो बाच बेनती चौपई
Kabiyo Baach Benti Chaupai

श्लोक 1

हमरी करो हाथ दै रੱछा पूरन होइ चित की इੱछा
Hamri Karo Hath Dai Rachha Pooran Hoi Chit Ki Ichha

श्लोक 2

तब चरनन मन रहै हमारा अपना जान करो प्रतिपारा १
Tab Charnan Man Rahai Hamara Apna Jaan Karo Pratipara

श्लोक 3

ह<bos>3 दुस਼ट सभै तुम आवहु हमी पीछै आप हाथ दै बचैहु हमीछै
Hamre Dusht Sabhai Tum Aavhu Hami Peechhai Aap Hath Dai Bachaihu Hamichhai

श्लोक 4

सुखी बसै मोरो परवारा सेवक सिੱख सभै करतारा २
Sukhi Basai Moro Parvara Sevak Sikh Sabhai Kartara

श्लोक 5

मो रੱछा निज कर दै करीऐ सभ बैरन को आज संघरीऐ
Mo Rachha Nij Kar Dai Kareeai Sabh Bairan Ko Aaj Sanghreeai

श्लोक 6

पूरन होइ हमारी आस सोर भजन की रहै पिआस ३
Pooran Hoi Hamari Aas Tor Bhajan Ki Rahai Pias

श्लोक 7

तुमहि भाड चुनि हमारा दुस਼ट दोखीयन छय हमारा
Tumhi Bhaad Chuni Hamara Dusht Dokhiyan Chhay Hamara

श्लोक 8

आप हाथ दै मुझहि बचावहु दुस਼ट बीछ बिखय मो घावहु ४
Aap Hath Dai Mujhah Bachavhu Dusht Beech Bikhya Mo Ghavhu

श्लोक 9

जहां जहां तुम पाधारो रੱछा करहु सदा हमारो
Jahan Jahan Tum Padharo Rachha Karhu Sada Hamaro

श्लोक 10

परम हाथ दै हमहि बचावहु सभ बैरन को आज मिटावहु ५
Param Hath Dai Hamah Bachavhu Sabh Bairan Ko Aaj Mitavhu

श्लोक 11

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह चौपाई दशम ग्रंथ का एक भाग है, जो परंपरागत रूप से गुरु गोबिंद सिंह जी की रचना मानी जाती है। इसे सिख धर्म में प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है, खासकर सुबह के समय या किसी शुभ कार्य की शुरुआत में। इसमें भक्त ईश्वर से अपने परिवार, सेवकों और शिष्यों की रक्षा तथा शत्रुओं से सुरक्षा की विनती करता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Guru Gobind Singh Ji · सिख गुरु (दशम) · 1666–1708 ईस्वी, पंजाब एवं अन्यत्र

दशम एवं अंतिम मानव सिख गुरु, जिन्होंने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की तथा जाप साहिब एवं चौपई साहिब सहित शौर्य एवं भक्ति की वाणी रची, जो बाद में दशम ग्रंथ में संकलित हुई। अपने देहावसान से पूर्व, उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित किया।

क्या आप जानते हैं?

रचयिता

यह रचना दशम गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा रचित है, जो सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु थे। यह उनकी प्रसिद्ध प्रार्थना ‘कबियोबाच बैंति चौपाई’ का अंश है, जिसे ‘चौपाई साहिब’ भी कहा जाता है।

ग्रंथ समावेश

यह चौपाई दशम ग्रंथ (दसम ग्रंथ) के ‘चौपाई’ खंड में शामिल है। दशम ग्रंथ, गुरु गोबिंद सिंह जी की रचनाओं का संकलन है और सिख धर्म के पवित्र ग्रंथों में गिना जाता है।

उद्देश्य

इस प्रार्थना का मुख्य उद्देश्य परमात्मा से रक्षा की प्रार्थना करना है। इसमें शत्रुओं, बुरी शक्तियों और संकटों से बचाने की विनती की गई है, साथ ही अपने परिवार और सेवकों की सुरक्षा का आग्रह किया गया है।

प्रयोग एवं महत्व

सिख धर्म के अनुयायी इस चौपाई को नित्य प्रार्थना (अमृत वेला या शाम के समय) और विशेष अवसरों पर पाठ करते हैं। मान्यता है कि इसके नियमित पाठ से मानसिक शांति, भय से मुक्ति और आध्यात्मिक सुरक्षा मिलती है।

छंद एवं भाषा

यह रचना ‘चौपाई’ छंद में लिखी गई है, जो हर पंक्ति में ४-४ चरणों वाला एक मात्रिक छंद है। इसमें ब्रज भाषा, पंजाबी और खड़ी बोली का मिश्रण है, जो उस काल की साहित्यिक शैली को दर्शाता है।

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