Bharat Devotion
Embroidered artwork for भक्ति ही प्रभु तक पहुंचाती है: Embroidered Khanda emblem with a saffron Nishan Sahib flag and marigolds at sunrise

भक्ति ही प्रभु तक पहुंचाती है

भक्ति ही प्रभु तक पहुंचाती है

यह एक गुरबाणी का भाग है जो बताता है कि बाहरी रीति-रिवाज, तीर्थ, पाठ, और संसार की शक्ति मोक्ष नहीं देगी; पनाकी एकमात्र उपाय भगवान से सच्चा निःस्वार्थ।।

श्लोक

ॐ सतिगुर प्रसादि पातिसाही १० त्व प्रसादि सवये
Ik Oankar Satgur Prasad || Patshahi 10 || Tav Prasad || Savaiye ||

श्लोक 1

स्रावग सुध समूह सिधान के देखि फिरिओ घर जोग जती के सूर सुरारदन सुध सुधादिक संत समूह अनेक मती के सारे ही देस को देखि रहिओ मत कोऊ न देखीअत प्रानपती के स्री भगवान की भाइ क्रिपा हू तੵे एक रती बिनु एक रती के १२१
Shravag Sudh Samooh Sidhan Ke Dekh Phirio Ghar Jog Jati Ke || Soor Surardan Sudh Sudhadik Sant Samooh Anek Mati Ke || Saare Hi Des Ko Dekh Rahio Mat Ko-oo Na Dekhiat Pranpati Ke || Shri Bhagwan Ki Bhaaye Kripa Hu Te Ek Rati Bin Ek Rati Ke ||1||21||

श्लोक 2

माते मतंग जरे जर संग अनूप उतंग सुरंग सवारे कोट तुरंग कुरंग से कूदत पउन के गउन को जात निवारे भारी भुजान के भूप भली बिधि निआवत सीस न जात बिचारे एते भए तु कहा भए भूपति अंत को नांगे ही पांइ पधारे २२२
Maate Matang Jare Jar Sang Anoop Utang Surang Sawaare || Kot Turang Kurang Se Koodat Paun Ke Gaun Ko Jaat Nivaare || Bhaari Bhujaan Ke Bhoop Bhali Bidh Nyaavat Sees Na Jaat Bichaare || Ete Bhaye Tu Kahaa Bhaye Bhoopat Ant Ko Naange Hi Paaye Padhare ||2||22||

श्लोक 3

जीत फिरै सभ देस दिसान को बाजत ढोल म्रिदंग नगारे गुंजत गूड़्ह गजान के सुंदर हिंसत हैं हयराज हजारे भूत भविख भवान के भूपत कउनु गनै नहीं जात बिचारे स्री पति स्री भगवान भजे बिनु अंत कउ अंत के धाम सिधारे ३२३
Jeet Phirai Sabh Des Disan Ko Baajat Dhol Mridang Nagaare || Gunjat Goodh Gajaan Ke Sundar Hinst Hain Hayraaj Hajaare || Bhoot Bhavikh Bhavaan Ke Bhoopat Kaun Ganai Nahi Jaat Bichaare || Shri Pat Shri Bhagwan Bhaje Bin Ant Kau Ant Ke Dhaam Sidhaare ||3||23||

श्लोक 4

तीरथ नान दइआ दम दान सु संजम नेम अनेक बिसेखै बेद पुरान कतेब कुरान जमीन जमान सबान के पेखै पउन अहार जती जत धार सबै सु बिचार हजार क देखै स्री भगवान भजे बिनु भूपति एक रती बिनु एक न लेखै ४२४
Teerath Snaan Daya Dam Daan Su Sanjam Nem Anek Bisekhe || Bed Puraan Kateb Kuraan Jameen Jamaan Sabaan Ke Pekhe || Paun Ahaar Jati Jat Dhaar Sabai Su Bichaar Hajaar Ka Dekhe || Shri Bhagwan Bhaje Bin Bhoopat Ek Rati Bin Ek Na Lekhe ||4||24||

श्लोक 5

सुध सिपाह दुरंत दुबाह सु साज सनाह दुरजान दलैंगे भारी गुमान भरे मन मैं कर परबत पंख हले न हलैंगे तोरि अरीन मरोरि मवासन माते मतंगनि मान मलैंगे स्री पति स्री भगवान क्रिपा बिनु तिआगि जहान निदान चलैंगे ५२५
Sudh Sipaah Durant Dubaah Su Saaj Sanaah Durjaan Dalainge || Bhaari Gumaan Bhare Man Main Kar Parbat Pankh Hale Na Halainge || Tor Areen Maror Mawaasan Maate Matangan Maan Malainge || Shri Pat Shri Bhagwan Kripa Bin Tyaag Jahaan Nidaan Chalainge ||5||25||

श्लोक 6

बीर अपार बडे बरिआर अबिचारहि सार की धार भछया तोरत देस मलिंद मवासन माते गजान के मान मलया गाड़्हे गड़्हान को तोड़नहार सु बातन हीं चक चार लवया साहिबु स्री सभ को सिरनाइक जाचक अनेक सु एक दिवया ६२८ [sic]
Beer Apaar Bade Baryaar Abichaareh Saar Ki Dhaar Bhachhaya || Torat Des Malind Mawaasan Maate Gajaan Ke Maan Malaya || Gaadhe Gadhaan Ko Todanhaar Su Baatan Heen Chak Chaar Lavaya || Saahib Shri Sabh Ko Sirnaayak Jaachak Anek Su Ek Divaya ||6||28||

श्लोक 7

दानव देव फनिंद निसाचर भूत भविख भवान जपैंगे जीव जिते जल मै थल मै पल ही पल मै सभ थाप थपैंगे पुंन प्रतापन बाढ जैत धुन पापन के बहु पुंज खपैंगे साध समूह प्रसंन फिरैं जग सत्र सभै अवलोक चपैंगे ७२७
Daanav Dev Fanind Nisaachar Bhoot Bhavikh Bhavaan Japainge || Jeev Jite Jal Mai Thal Mai Pal Hi Pal Mai Sabh Thaap Thapainge || Punn Partaapan Baadh Jait Dhun Paapan Ke Bahu Punj Khapainge || Saadh Samooh Prasann Phirai Jag Satra Sabhai Avalok Chapainge ||7||27||

श्लोक 8

मानव इंद्र गजिंद्र नराधप जौन त्रिलोक को राजु करैंगे कोटि इसनान गजादिक दान अनेक सुअंबर साजि बरैंगे ब्रहम महेसर बिसन सचीपति अंत फसे जम फास परैंगे जे नर स्री पति के प्रस हैं पग ते नर फेर न देह धरैंगे ८२८
Maanav Indra Gajindra Naraadhap Jaun Trilok Ko Raaj Karainge || Kot Isnaan Gajaadik Daan Anek Suambar Saaj Barainge || Brahm Mahesar Bisan Sacheepat Ant Fase Jam Faas Parainge || Je Nar Shri Pat Ke Pras Hain Pag Te Nar Pher Na Deh Dharainge ||8||28||

श्लोक 9

कहा भयो जो दोऊ लोचन मूंद कै बैठि रहिओ बक धिआन लगाइओ न्हात फिरिओ लीए सात समुद्रनि लोक गयो परलोक गवाइओ बास कीओ बिखिआन सों बैठ कै ऐसे ही ऐसे सु बैस बिताइओ साचु कहों सुन लेहु सभै जिन प्रेम कीओ तिन ही प्रभु पाइओ ९२९
Kahaa Bhayo Jo Do-oo Lochan Moond Kai Baith Rahio Bak Dhyaan Lagaayo || Nhaat Phirio Leeye Saat Samudran Lok Gayo Parlok Gawaayo || Baas Keeyo Bikhyaan So Baith Kai Aise Hi Aise Su Bais Bitaayo || Saach Kaho Sun Leho Sabhai Jin Prem Keeyo Tin Hi Prabh Paayo ||9||29||

श्लोक 10

काहू लै पाहन पूज धरयो सिर काहू लै लिंग गरे लटकाइओ काहू लखिओ हरि अवाची दिसा महि काहू पछाह को सीसु निवाइओ कोऊ बुतान को पूजत है पसु कोऊ म्रितान को पूजन धाइओ कूर क्रिआ उरझिओ सभ ही जग स्री भगवान को भेदु न पाइओ १०३०
Kaahu Lai Paahan Pooj Dharyo Sir Kaahu Lai Ling Gare Latkaayo || Kaahu Lakhio Har Avaachi Disaa Meh Kaahu Pachhaah Ko Sees Nivaayo || Ko-oo Butaan Ko Poojat Hai Pasu Ko-oo Mritaan Ko Poojan Dhaayo || Koor Kriyaa Urajhio Sabh Hi Jag Shri Bhagwan Ko Bhed Na Paayo ||10||30||

श्लोक 11

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

पाठ दशम ग्रsници, जिसे श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की रचना माना जाता है, से लिया। है। इसमें सवैये (एक प्रकार का संस्कृत कविता) उपयोग किए गए हैं; यह सिख परंपरा के प्रत्रथा में मन्त्र और पा डाथे क चौनता में प्रयोग होते हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Guru Gobind Singh Ji · सिख गुरु (दशम) · 1666–1708 ईस्वी, पंजाब एवं अन्यत्र

दशम एवं अंतिम मानव सिख गुरु, जिन्होंने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की तथा जाप साहिब एवं चौपई साहिब सहित शौर्य एवं भक्ति की वाणी रची, जो बाद में दशम ग्रंथ में संकलित हुई। अपने देहावसान से पूर्व, उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित किया।

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क्या आप जानते हैं?

रचनाकार एवं स्रोत

ये पद्य गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा रचित 'दसम ग्रंथ' के 'सवैये' भाग से हैं। 'पातिशाही १०' और 'त्व प्रसादि' शीर्षक इसे गुरु साहिब की वाणी के रूप में चिह्नित करते हैं। यहाँ वे बाहरी आडंबरों और सांसारिक शक्ति के घमंड की निरर्थकता पर प्रकाश डालते हैं।

सांसारिक वैभव की क्षणभंगुरता

गुरु साहिब स्पष्ट करते हैं कि हाथी, घोड़े, सेना और राज्य का घमंड अंततः मिट्टी में मिल जाता है (पद्य २-३)। चाहे कोई कितना भी बड़ा राजा क्यों न हो, अंत में उसे नंगे पाँव ही जाना पड़ता है। यह मानव जीवन की अनित्यता का गहरा बोध कराता है।

बाहरी कर्मकांडों की निंदा

गुरु साहिब ने आँखें बंद करके ध्यान लगाने, सात समुद्रों में स्नान करने, पत्थर या लिंग की पूजा करने जैसे कर्मों को व्यर्थ बताया है (पद्य ९-१०)। वे कहते हैं कि इन सबसे ईश्वर का भेद नहीं मिलता। असली साधना प्रेम और भक्ति में है।

प्रेम ही प्रभु-प्राप्ति का मार्ग

'जिन प्रेम कीयो तिन ही प्रभु पायो' – यह पंक्ति (पद्य ९) गुरु साहिब का सबसे सशक्त संदेश है। बिना प्रेम के कोई भी तप, दान या योग सफल नहीं होता। प्रेम ही वह एकमात्र रति (तनिक मात्र) है जो परमात्मा से जोड़ती है।

एक ईश्वर, अनेक भ्रम

गुरु साहिब ने विभिन्न पंथों और मतों की बाहरी विधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि सब एक ही सत्य की ओर इशारा करते हैं, पर लोग भेद नहीं पाते (पद्य १०)। वे 'स्री भगवान' (एक परमेश्वर) की भक्ति पर बल देते हैं, न कि किसी विशेष रूप या स्थान पर।

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