कीर्तन सोहिला (सोहिला साहिब)
कीर्तन सोहिला गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 12–13) के पाँच शब्दों की रात्रि-प्रार्थना है, जो सोने से पहले और अंतिम संस्कार में पढ़ी जाती है।
श्लोक
एक सत्यस्वरूप परमात्मा है, सद्गुरु की कृपा से।
श्लोक 1
सोहिला राग गौड़ी दीपकी में, प्रथम गुरु की वाणी।
श्लोक 2
एक सत्यस्वरूप परमात्मा है, सद्गुरु की कृपा से।
श्लोक 3
जिस घर में सृष्टिकर्ता की कीर्ति का गान हो और उसका चिंतन किया जाए, उस घर में सोहिला गाओ और सृजनहार को स्मरण करो।
श्लोक 4
तुम मेरे निर्भय प्रभु का सोहिला गाओ। मैं उस सोहिले पर वारी जाता हूँ जिससे सदा सुख होता है।
श्लोक 5
नित्य प्रति जीवों की सम्भाल होती है, देने वाला उन्हें देखता रहेगा। तेरे दान का मूल्य नहीं आंका जा सकता, उस दाता का क्या गणना है?
श्लोक 6
संवत और तिथि लिखी गई, मिलकर तेल डालो। हे सजनों, आशीर्वाद दो कि साहिब से मिलन हो।
श्लोक 7
घर-घर यही निमंत्रण है, प्रतिदिन बुलावे आते हैं। हे नानक, बुलाने वाले का स्मरण करो, वे दिन आने वाले हैं।
श्लोक 8
राग आसा, प्रथम महला।
श्लोक 9
छह घर, छह गुरु, छह उपदेश। गुरु एक ही है, पर अनेक रूप हैं।
श्लोक 10
हे बाबा, जिस घर में सृष्टिकर्ता की कीर्ति होती है, उस घर को संभालो, तुम्हारी ही महिमा है।
श्लोक 11
पल, क्षण, घड़ियाँ, पहर, तिथियाँ, वार, महीने हुए। सूर्य एक है, पर ऋतुएँ अनेक। हे नानक, कर्ता के अनेक रूप हैं।
श्लोक 12
राग धनासरी, प्रथम महला।
श्लोक 13
आकाश थाल है, सूर्य और चंद्रमा दीपक हैं, तारों का समूह मोती हैं। चंदन की धूप है, वायु चँवर कर रही है, और सभी वन-राजियाँ फूलों की ज्योति हैं।
श्लोक 14
कैसी आरती है! हे भव-भय नाशक, तेरी यह आरती है। अनहद शब्द बज रहा है, और भेरी बज रही है।
श्लोक 15
हजारों तेरे नेत्र हैं, फिर भी तेरे कोई नेत्र नहीं। हजारों तेरी मूर्तियाँ हैं, फिर भी तू एक ही है। हजारों तेरे पवित्र चरण हैं, फिर भी तेरे कोई चरण नहीं। हजारों तेरी गंधें हैं, फिर भी तू गंध रहित है। इस प्रकार तू मोहित करने वाली लीला कर रहा है।
श्लोक 16
सबमें ज्योति है, वह ज्योति वही है। उसके प्रकाश से सबमें प्रकाश होता है। गुरु की साक्षी से ज्योति प्रकट होती है। जो उसे भाए, वही आरती है।
श्लोक 17
मेरा मन हरि के चरण-कमल के मकरंद में लोभित है, मुझे दिन-रात प्यास लगी है। हे प्रभु, नानक को कृपा का जल दे, जिससे तेरे नाम में वास हो।
श्लोक 18
राग गौड़ी पूरबी, चौथा महला।
श्लोक 19
काम और क्रोध से नगर बहुत भरा हुआ है, साधु के मिलने से वह टुकड़े-टुकड़े हो गया। पूर्व लिखे लेख से गुरु मिला, मन में हरि की लव मंडल बन गया।
श्लोक 20
साधु को अंजलि करो, बड़ा पुण्य है। दंडवत करो, बड़ा पुण्य है।
श्लोक 21
साकत हरि के रस का स्वाद नहीं जानते, उनके अंदर अहंकार का कांटा है। जैसे-जैसे चलते हैं, चुभता है और दुख पाते हैं, सिर पर यमराज का दंड सहते हैं।
श्लोक 22
हरि के भक्त हरि-नाम में समा गए, उन्होंने जन्म-मरण के भव-दुख को खंडित कर दिया। अविनाशी पुरुष, परमेश्वर को पा लिया, ब्रह्मांड के सभी लोकों में उनकी बहुत शोभा है।
श्लोक 23
हम गरीब और दीन हैं, प्रभु, तेरे हैं; हे महान प्रभु, रक्षा करो, रक्षा करो। दास नानक का आधार और टेक नाम है, हरि के नाम में ही सुख मिलता है।
श्लोक 24
राग गौड़ी पूरबी, पाँचवाँ महला।
श्लोक 25
मैं विनती करता हूँ, सुनो हे मेरे मित्रों, संतों की सेवा का समय है। यहाँ हरि का लाभ कमाओ, आगे सुंदर निवास होगा।
श्लोक 26
आयु घट रही है, दिन-रात। हे मन, गुरु से मिलकर कार्य सुधरेंगे।
श्लोक 27
यह संसार विकार और संशय में है, ब्रह्मज्ञानी इससे पार हो गया। जिसे प्रभु जगाकर यह रस पिलाता है, वह अकथ कथा को जानता है।
श्लोक 28
जिसके लिए आए हो, वही मोल लो। गुरु से हरि मन में बसते हैं। अपने निज घर में महल पाओगे, सुख और सहजता से, फिर जन्म-मरण का फेरा नहीं होगा।
श्लोक 29
हे अंतर्यामी, पुरुष, विधाता, मन की श्रद्धा पूरी करो। दास नानक यह सुख माँगता है – मुझे संतों की धूल बना दो।
श्लोक 30
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
कीर्तन सोहिला गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 12 और 13 पर दर्ज पाँच शब्दों का समूह है। इनमें तीन गुरु नानक देव जी के, एक गुरु राम दास जी का और एक गुरु अर्जन देव जी का है। सिख इसे रात को सोने से पहले पढ़ते हैं, और यह गुरुद्वारे में संध्या-सेवा के अंत में तथा अंतिम संस्कार के समय भी पढ़ा जाता है। शब्द राग गौड़ी दीपकी, आसा, धनासरी और गौड़ी पूरबी में हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Guru Nanak Dev Ji · सिख गुरु (प्रथम) · 1469–1539 ईस्वी, पंजाब
सिख धर्म के संस्थापक एवं दस सिख गुरुओं में प्रथम, तलवंडी (वर्तमान ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में जन्मे। उन्होंने ईश्वर की एकता एवं समस्त मनुष्यों की समानता का संदेश फैलाने हेतु दक्षिण एशिया एवं उससे परे लंबी यात्राएं (उदासियां) कीं, तथा उनकी वाणी बाद में गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित की गई।
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लेखक
इसके पहले तीन शब्द (राग गौड़ी दीपकी, आसा, धनासरी) गुरु नानक देव जी (महला 1) के हैं। चौथा और पाँचवाँ शब्द (राग गौड़ी पूरबी) क्रमशः गुरु राम दास जी (महला 4) और गुरु अर्जन देव जी (महला 5) के हैं।
सोहिला का अर्थ
'सोहिला' एक प्रकार का गीत है जो खुशी के अवसरों पर गाया जाता है, लेकिन गुरु नानक ने इसे आध्यात्मिक रूप दिया। यह पाठ रात को सोने से पहले पढ़ा जाता है और इसमें प्रभु की स्तुति और जीवन की नश्वरता पर ध्यान दिया गया है।
गगन में थाल की आरती
तीसरा शब्द, राग धनासरी में, प्रसिद्ध आरती 'गगन मै थालु' है। इसमें आकाश थाल है, सूरज और चाँद दीपक हैं, तारे मोती हैं, चंदन की सुगंध धूप है और पवन चँवर है। पूरी सृष्टि प्रभु की आरती करती दिखाई गई है।
तीसरे पद में शादी के संकेत
'संबति साहा लिखिआ' (सोहिला का तीसरा पद) विवाह रीति-रिवाजों की ओर इशारा करता है - वर्ष, लग्न और तेल लगाना। गुरु नानक इसका आध्यात्मिक अर्थ देते हैं: आत्मा का परमात्मा से मिलन ही सच्चा विवाह है।
छह घरों का रहस्य
आसा राग में 'छिअ घर छिअ गुर' का उल्लेख छह शास्त्रों या दर्शनों की ओर संकेत करता है, पर गुरु एक ही हैं, हालाँकि भेष अनेक। यह धार्मिक मार्गों की एकता को दर्शाता है।
गौड़ी पूरबी में संदेश
अंतिम दो शब्दों में काम-क्रोध से मुक्ति, संतों की संगति और हरि-नाम के सहारे का महत्व बताया गया है। पाँचवाँ शब्द गुरु अर्जन देव जी का है और संतों की चरण-धूलि की याचना के साथ समाप्त होता है।
Guru Nanak Dev Ji
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