श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पवित्र शब्द — किर्तन और नित्नेम के लिए — गुरमुखी लिपि, उच्चारण और अर्थ सहित 28 भाषाओं में।
सिख अरदास संगत की साझा प्रार्थना है, जो गुरु गोबिंद सिंह जी की 'वार श्री भगौती जी की' की पहली पउड़ी से आरंभ होकर सर्वत्र के कल्याण की याचना पर समाप्त होती है।
यह एक सिख प्रार्थना है जो ईश्वर की रक्षा और कृपा की स्तुति करती है। इसमें भक्तों को संतों की संगति में संसार-समुद्र से पार उतारने और दुष्टों का नाश करने की प्रार्थना की गई है।
यह दिव्य पंक्तियाँ गुरु के चरण कमलों के ध्यान की महिमा का वर्णन करती हैं, जिससे भवसागर पार होता है और सभी दुख, भ्रम तथा भय नष्ट हो जाते हैं।
यह रचना एक काल्पनिक शहर 'बेगम पुरा' का वर्णन करती है, जहाँ न कोई दुख है, न भय, न कर, और न कोई चिंता। यह मोक्ष या परम शांति की अवस्था का एक प्रतीकात्मक चित्रण है।
यह शबद संत रविदास जी द्वारा रचित है, जिसमें वे परमात्मा की महिमा का गुणगान करते हैं और बताते हैं कि वह दीन-दुखियों की रक्षा करते हैं तथा नीच को ऊँचा बनाते हैं।
यह भक्त रविदास द्वारा रचित एक आध्यात्मिक गीत है, जिसमें आत्मा और परमात्मा के मिलन की गहरी लालसा और उस मिलन से मिलने वाले आनंद का वर्णन है।
यह एक भक्ति गीत है जिसमें भगत रविदास जी समझाते हैं कि जब तक हम अपने अहंकार में थे, तब तक परमात्मा हमसे दूर लगते थे, पर जब हमने अपने आप को उनमें समर्पित कर दिया, तो हम और वे एक हो गए। वे पानी की लहर और पानी, सोने के गहने और सोने, तथा पतंगे और आग जैसे उदाहरणों से इस एकता को समझाते हैं।
यह रविदास जी का एक भक्ति पद है, जो मिट्टी के बने मानव शरीर की नश्वरता और माया के मोह को समझाता है।
यह रचना भक्त रविदास की है, जिसमें वे अपनी नीच समझी जाने वाली जाति (चमार) का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि प्रभु के नाम का रस पीकर वे पवित्र हो गए हैं। वे समझाते हैं कि बाहरी तीर्थों और रीति-रिवाजों से नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति और संतों की संगति से ही संसार-सागर पार किया जा सकता है।
यह कबीर का प्रसिद्ध भजन है, जिसमें मानव शरीर को एक सुंदर चद्दर (वस्त्र) के रूप में देखा गया है। यह चद्दर योग की नाड़ियों, पाँच तत्त्वों और आठ कमल-दलों से बुनी गई है, और इसे बिना मैला किए (अर्थात सांसारिक विकारों से बचाकर) रखना ही जीवन की सफलता है।