Bharat Devotion
Embroidered artwork for भगत रविदास जी की सोरठि राग में बाणी: मैं और तू एक हैं: Guru Ravidas seated by a river at dawn with one hand raised in blessing, embroidered

भगत रविदास जी की सोरठि राग में बाणी

मैं और तू एक हैं

भगत रविदास जी की सोरठि राग में बाणी

मैं और तू एक हैं

यह एक भक्ति गीत है जिसमें भगत रविदास जी समझाते हैं कि जब तक हम अपने अहंकार में थे, तब तक परमात्मा हमसे दूर लगते थे, पर जब हमने अपने आप को उनमें समर्पित कर दिया, तो हम और वे एक हो गए। वे पानी की लहर और पानी, सोने के गहने और सोने, तथा पतंगे और आग जैसे उदाहरणों से इस एकता को समझाते हैं।

श्लोक

सोरठि
Sorath

श्लोक 1

जब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाही अनल अगम जैसे लहरि मोद जल केवल जल माही १
Jab Ham Hote Tab Too Naahi Ab Toohee Mai Naahi Anal Agam Jaise Lahar Mod Jal Keval Jal Maahi ||1||

श्लोक 2

माधवे किआ कहीऐ भ्रमु ऐसा जैसे मानुख मेरि जीउ जैसे १ रहाउ
Maadhave Kia Kaheeai Bhram Aisa Jaise Maanukh Meri Jeeu Jaise ||1|| Rahaau ||

श्लोक 3

जैसे कनक कटक जल कुंभ का जलु जलहि समाइआ कथत कथि कथि को ब्रह्मु न जानै चीन्ह्हि राम राइआ २
Jaise Kanak Katak Jal Kumbh Ka Jal Jalahi Samaaia Kathat Kath Kath Ko Brahm Na Jaanai Cheenhi Ram Raaia ||2||

श्लोक 4

जैसे रबि किरन कहे जलु मूठै त्रिख म्रिग भ्रमु भुलाइआ कथत कथि कथि को ब्रह्मु न जानै चीन्ह्हि राम राइआ ३
Jaise Rab Kiran Kahe Jal Moothai Trikh Mrig Bhram Bhulaaia Kathat Kath Kath Ko Brahm Na Jaanai Cheenhi Ram Raaia ||3||

श्लोक 5

मनु रंगाए रंगु साचै राइआ जैसे रंगु मजीठ कै रंगु न लागै काचा माइआ ४
Man Rangaaai Rang Saachai Raaia Jaise Rang Majeeth Kai Rang Na Laagai Kaacha Maaia ||4||

श्लोक 6

कहै रविदासु हथ भाइआ जैसे पाटु पतंगु तरंगु तउ महि तनु मनु गइआ समाइआ ५१
Kahai Ravidaas Hath Bhaaia Jaise Paat Patang Tarang Tau Mah Tan Man Gaia Samaaia ||5||1||

श्लोक 7

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह पवित्र बाणी गुरु ग्रंथ साहिब में सोरठि राग में दर्ज है, जिसे भगत रविदास जी ने रचा है। यह भक्ति परंपरा का एक अमूल्य रत्न है, जिसमें परमात्मा के साथ आत्मा के एकत्व (अद्वैत) का गहरा संदेश दिया गया है। इस बाणी को प्रायः सुबह की प्रार्थना या ध्यान के समय गाया जाता है, और यह सिख धर्म के साथ-साथ संत परंपरा में भी अत्यंत श्रद्धा से सुनी जाती है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Bhagat Ravidas · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं–16वीं शताब्दी, वाराणसी

वाराणसी के एक कवि-संत एवं पेशे से चर्मकार, जिनकी वाणी ने बेगमपुरा — दुःख, भय एवं जातिगत विषमता से मुक्त एक आदर्श लोक — की कल्पना प्रस्तुत की। उनकी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं तथा आधुनिक रविदासिया परंपरा की भक्ति-आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

रचनाकार

यह पद गुरु रविदास (15वीं शताब्दी) का है, जो काशी में एक चमार परिवार में जन्मे संत-कवि थे। भक्ति आंदोलन के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं और इनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है।

राग सोरठि

यह राग गुरु ग्रंथ साहिब के प्रमुख रागों में से एक है, जो विरह और मिलन की भावना को जगाता है। इस राग में रचित पद प्रायः आत्म-समर्पण और परमात्मा में लीन होने की बात करते हैं।

मुख्य उपमाएँ

इस पद में जीवात्मा और परमात्मा के अभेद को समझाने के लिए चार अनूठी उपमाएँ दी गई हैं: (1) लहर और जल – जैसे लहर जल में ही समाई है, वैसे ही जीव ब्रह्म में; (2) सोने का गहना और सोना – गहना मिट्टी का भ्रम है, असल में सोना ही है; (3) सूर्य की किरण और मृगतृष्णा – जैसे प्यासा हिरण पानी का भ्रम देखता है, वैसे ही संसार का भ्रम; (4) मजीठ का रंग – जैसे मजीठ से रंगा कपड़ा कभी कच्चा नहीं होता, वैसे ही सच्चे रंग में रंगा मन अटल होता है।

दार्शनिक संदेश

यह पद अद्वैत भाव को भक्ति के साथ जोड़ता है – जब मैं था, तब तू नहीं था; अब तू है, तो मैं नहीं। यह कहता है कि ब्रह्म को शब्दों से नहीं जाना जा सकता, केवल राम (परमात्मा) को पहचानने से ही यह भ्रम मिटता है।

संरचना

इस पद में पाँच पद (स्तर) और एक रहाउ (टेक) है। रहाउ में कहा गया है कि यह भ्रम ऐसा है जैसे मनुष्य 'मेरा' कहकर जीवन जीता है – अर्थात अहंकार ही मूल भ्रम है। अंतिम पद में रविदास कहते हैं कि जैसे पतंगा आग में समा जाता है, वैसे ही मेरा तन-मन परमात्मा में लीन हो गया।

Guru Ravidas Ji की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Guru Ravidas Ji

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