भगत रविदास जी की सोरठि राग में बाणी
मैं और तू एक हैं
यह एक भक्ति गीत है जिसमें भगत रविदास जी समझाते हैं कि जब तक हम अपने अहंकार में थे, तब तक परमात्मा हमसे दूर लगते थे, पर जब हमने अपने आप को उनमें समर्पित कर दिया, तो हम और वे एक हो गए। वे पानी की लहर और पानी, सोने के गहने और सोने, तथा पतंगे और आग जैसे उदाहरणों से इस एकता को समझाते हैं।
श्लोक
हे प्रभु! सोरठ राग में तेरा गान करते हुए, मैं तेरी शरण में हूँ।
श्लोक 1
हे प्रभु! जब तक मेरे भीतर अहंकार का भाव था, तब तक तेरा साक्षात्कार नहीं हुआ था; अब जब तू मुझमें प्रकट हो गया है, तो मेरा यह 'मैं' (अहंकार) पूरी तरह मिट गया है। जिस प्रकार अथाह जल में उत्पन्न होने वाली लहरें जल की ही क्रीड़ा हैं और जल से भिन्न उनका कोई अस्तित्व नहीं है, उसी प्रकार हे प्रभु! तुझसे अलग मेरा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।
श्लोक 2
हे मायापति माधव! मैं तुम्हें क्या बताऊँ कि मेरा यह कैसा अज्ञान और भ्रम है? मेरा हाल तो ठीक वैसा ही है, जैसे मनुष्य को रस्सी में भूलवश साँप का भ्रम हो जाता है।
श्लोक 3
हे प्रभु! जिस प्रकार सोने से बने कंगन में सोना ही होता है, या जैसे जल के घड़े के भीतर का जल अंततः बाहर के व्यापक जल में ही लीन हो जाता है, वैसे ही यह जीव तुझमें समाया हुआ है। केवल कथाएँ और शास्त्रार्थ करने से कोई भी ब्रह्म को नहीं जान सकता; उसे तो केवल प्रभु राम की कृपा से ही पहचाना जा सकता है।
श्लोक 4
जिस प्रकार मरुस्थल में सूर्य की किरणों को देखकर मृग भ्रमित हो जाता है और प्यास बुझाने के लिए जल समझकर दौड़ता है, किंतु वहाँ जल नहीं होता, वैसे ही अज्ञानवश मनुष्य इस संसार को सत्य मानकर भटकता है। केवल बातें बनाने से कोई ब्रह्म को नहीं जान सकता; प्रभु को तो केवल उनके सच्चे ज्ञान द्वारा ही पहचाना जा सकता है।
श्लोक 5
मेरा यह मन सच्चे प्रभु के नाम के रंग में ऐसा रंग गया है, जैसे मजीठ का पक्का रंग होता है, जिस पर माया का कोई भी कच्चा रंग नहीं चढ़ सकता।
श्लोक 6
संत रविदास जी कहते हैं कि मेरे दोनों हाथ प्रभु के प्रेम में जुड़ गए हैं। जिस प्रकार रेशम का धागा और जल की तरंग उसी में विलीन हो जाती है, वैसे ही मेरा यह तन और मन प्रभु के चरणों में लीन हो गया है।
श्लोक 7
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह पवित्र बाणी गुरु ग्रंथ साहिब में सोरठि राग में दर्ज है, जिसे भगत रविदास जी ने रचा है। यह भक्ति परंपरा का एक अमूल्य रत्न है, जिसमें परमात्मा के साथ आत्मा के एकत्व (अद्वैत) का गहरा संदेश दिया गया है। इस बाणी को प्रायः सुबह की प्रार्थना या ध्यान के समय गाया जाता है, और यह सिख धर्म के साथ-साथ संत परंपरा में भी अत्यंत श्रद्धा से सुनी जाती है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Bhagat Ravidas · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं–16वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक कवि-संत एवं पेशे से चर्मकार, जिनकी वाणी ने बेगमपुरा — दुःख, भय एवं जातिगत विषमता से मुक्त एक आदर्श लोक — की कल्पना प्रस्तुत की। उनकी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं तथा आधुनिक रविदासिया परंपरा की भक्ति-आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
रचनाकार
यह पद गुरु रविदास (15वीं शताब्दी) का है, जो काशी में एक चमार परिवार में जन्मे संत-कवि थे। भक्ति आंदोलन के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं और इनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है।
राग सोरठि
यह राग गुरु ग्रंथ साहिब के प्रमुख रागों में से एक है, जो विरह और मिलन की भावना को जगाता है। इस राग में रचित पद प्रायः आत्म-समर्पण और परमात्मा में लीन होने की बात करते हैं।
मुख्य उपमाएँ
इस पद में जीवात्मा और परमात्मा के अभेद को समझाने के लिए चार अनूठी उपमाएँ दी गई हैं: (1) लहर और जल – जैसे लहर जल में ही समाई है, वैसे ही जीव ब्रह्म में; (2) सोने का गहना और सोना – गहना मिट्टी का भ्रम है, असल में सोना ही है; (3) सूर्य की किरण और मृगतृष्णा – जैसे प्यासा हिरण पानी का भ्रम देखता है, वैसे ही संसार का भ्रम; (4) मजीठ का रंग – जैसे मजीठ से रंगा कपड़ा कभी कच्चा नहीं होता, वैसे ही सच्चे रंग में रंगा मन अटल होता है।
दार्शनिक संदेश
यह पद अद्वैत भाव को भक्ति के साथ जोड़ता है – जब मैं था, तब तू नहीं था; अब तू है, तो मैं नहीं। यह कहता है कि ब्रह्म को शब्दों से नहीं जाना जा सकता, केवल राम (परमात्मा) को पहचानने से ही यह भ्रम मिटता है।
संरचना
इस पद में पाँच पद (स्तर) और एक रहाउ (टेक) है। रहाउ में कहा गया है कि यह भ्रम ऐसा है जैसे मनुष्य 'मेरा' कहकर जीवन जीता है – अर्थात अहंकार ही मूल भ्रम है। अंतिम पद में रविदास कहते हैं कि जैसे पतंगा आग में समा जाता है, वैसे ही मेरा तन-मन परमात्मा में लीन हो गया।
Guru Ravidas Ji
रविदासिया धर्म से और
संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
