भक्त रविदास की प्रभु-मिलन की प्यास
यह भक्त रविदास द्वारा रचित एक आध्यात्मिक गीत है, जिसमें आत्मा और परमात्मा के मिलन की गहरी लालसा और उस मिलन से मिलने वाले आनंद का वर्णन है।
श्लोक
हे माधव! यह जीव अनेक जन्मों से आपसे बिछुड़ा था, किंतु यह आप ही के लेखे में है। शरीर, प्राण और जीवन के धन रूपी आपके दर्शन मात्र से मन राम-रस की रेखा के समान खिल उठा है। ॥१॥
श्लोक 1
हे सुंदर, सुजान और अनुपम स्वरूप वाले प्रभु! जीव के मोह में पड़कर मैं आपको भूल बैठा। भ्रम में भटककर मन पागल हो गया, जैसे चातक पक्षी प्रेम-पिपासु होता है। ॥१॥ रहाउ॥
श्लोक 2
जिस प्रकार अनेक प्रकार के विनोद किए जाते थे, उसी प्रकार मिलन का अवसर आया। अनेक प्रयत्नों से ध्यान किया, तो भी प्रेम का भाव मुझे नहीं छोड़ता। ॥२॥
श्लोक 3
मैंने अनेक रूप और अनेक रंग धारण किए, पर नव निधियाँ भी अनमोल हैं—उनका लेखा नहीं लगाया जा सकता। भक्ति से बिछुड़कर वह सब व्यर्थ हो गया; परमात्मा को अपने सेवक से मिलना स्वाभाविक ही है। ॥३॥
श्लोक 4
उस मिलन में निरंतर मिलते हुए जीव अनंत हो जाता है और फिर जन्म-मरण में नहीं आता। कहते हैं रविदास, मैं उस आशा पर जी रहा हूँ कि जिसके मिलने से परम गति प्राप्त होती है। ॥४॥१॥
श्लोक 5
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह भजन श्री गुरु ग्रंथ साहिब में धनासरी राग में संकलित है, जिसे संत रविदास ने रचा है। इसे प्रायः संगत में भजन या कीर्तन के रूप में गाया जाता है, विशेषकर उन दिनों में जब प्रभु-मिलन और वियोग की भावना पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। रविदास जी भारतीय संत परंपरा के प्रमुख कवि-संत हैं, जिनकी वाणी में सरल भाषा में गहरे आध्यात्मिक सिद्धांत व्यक्त होते हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Bhagat Ravidas · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं–16वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक कवि-संत एवं पेशे से चर्मकार, जिनकी वाणी ने बेगमपुरा — दुःख, भय एवं जातिगत विषमता से मुक्त एक आदर्श लोक — की कल्पना प्रस्तुत की। उनकी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं तथा आधुनिक रविदासिया परंपरा की भक्ति-आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
रचना परिचय
यह पद भक्त रविदास जी द्वारा रचित है और गुरु ग्रंथ साहिब के राग धनासरी में अंकित है (अंग 693)। राग धनासरी विरह और प्रभु-मिलन की गहरी भावना को व्यक्त करने के लिए जाना जाता है।
प्रमुख प्रतीक - चात्रिक पक्षी
रहाउ पंक्ति में 'चात्रिक' पक्षी का उल्लेख है, जो प्रेम और तड़प का प्रतीक है। यह पक्षी केवल स्वाति नक्षत्र की बूँद के लिए तरसता है, इसी प्रकार जीवात्मा प्रभु-मिलन के लिए व्याकुल रहती है।
नौ निधियों का संकेत
तीसरे चरण में 'नव निधि' (नौ खजाने) का जिक्र है। कहा गया है कि भगवान के गुणों का लेखा-जोखा नहीं लगाया जा सकता, और बिना भक्ति के ये सब खजाने भी बेकार हैं।
जन्मों के वियोग का समाधान
पहली पंक्ति में 'बहुत जनम बिछुरे' के माध्यम से प्रभु से लंबे वियोग का वर्णन है। अंतिम चरण में रविदास जी कहते हैं कि जो प्रभु से मिल जाता है, वह फिर जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं आता और परम गति को प्राप्त करता है।
Guru Ravidas Ji
रविदासिया धर्म से और
संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
