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Embroidered artwork for रविदास जी की बाणी – राग मारू: Guru Ravidas seated by a river at dawn with one hand raised in blessing, embroidered

रविदास जी की बाणी – राग मारू

रविदास जी की बाणी – राग मारू

यह शबद संत रविदास जी द्वारा रचित है, जिसमें वे परमात्मा की महिमा का गुणगान करते हैं और बताते हैं कि वह दीन-दुखियों की रक्षा करते हैं तथा नीच को ऊँचा बनाते हैं।

श्लोक

रागु मारू बाणी रविदास जीउ की ॐ सतिगुर प्रसादि
Raag Maaru Baani Ravidas Jeeo Kee Ik Onkar Satgur Prasad

श्लोक 1

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै १ रहाउ
Aisi Lal Tujh Bin Kaun Karai Gareeb Nivaj Gusaiya Mera Mathai Chhatar Dharai ||1|| Rahao ||

श्लोक 2

जा की छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै नीचह ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै १
Ja Ki Chhot Jagat Kau Lagai Ta Par Tuhin Dharai Neechah Uoch Karai Mera Gobind Kahoo Te Na Darai ||1||

श्लोक 3

नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै २१
Namdev Kabir Tilochan Sadhna Sain Tarai Kah Ravidas Sunhu Re Santahu Hari Jeeo Te Sabhai Sarai ||2||1||

श्लोक 4

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह शबद गुरु ग्रंथ साहिब के राग मारू में संकलित है, जो सिख धर्म का मुख्य ग्रंथ है। संत रविदास जी (लगभग १५वीं शताब्दी) भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत-कवि थे, जिनकी वाणी को गुरु अर्जन देव जी ने गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान दिया। यह शबद प्रभु की दया और गरीबों पर उनकी कृपा का वर्णन करता है, और अक्सर कीर्तन में गाया जाता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Bhagat Ravidas · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं–16वीं शताब्दी, वाराणसी

वाराणसी के एक कवि-संत एवं पेशे से चर्मकार, जिनकी वाणी ने बेगमपुरा — दुःख, भय एवं जातिगत विषमता से मुक्त एक आदर्श लोक — की कल्पना प्रस्तुत की। उनकी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं तथा आधुनिक रविदासिया परंपरा की भक्ति-आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

लेखक और पृष्ठभूमि

यह भजन 15वीं-16वीं शताब्दी के महान संत रविदास द्वारा रचित है, जो चमार (चर्मकार) जाति से आते थे—जिन्हें उस समय के समाज में 'अछूत' माना जाता था। यह रचना उसी सामाजिक भेदभाव को सीधे चुनौती देती है और ईश्वर की कृपा को जाति से ऊपर रखती है।

राग और संरचना

यह पद गुरु ग्रंथ साहिब में 'राग मारू' में दर्ज है, जो एक गंभीर और चिंतनशील राग है। इसकी 'रहाउ' (ध्रुव पंक्ति) ही मूल संदेश है, जो ईश्वर को दीन-दुखियों का रक्षक और उनके सिर पर सम्मान का छत्र धारण करने वाला बताती है।

सामाजिक उत्थान का सिद्धांत

"नीचह ऊच करै मेरा गोबिंदु" (मेरा गोबिंद नीच को ऊँचा करता है) पंक्ति एक क्रांतिकारी घोषणा है कि ईश्वर की कृपा मानव-निर्मित जाति व्यवस्था से परे है। यहाँ 'छत्र' (राजसी छतरी) का प्रतीक दर्शाता है कि ईश्वर विनम्र और तिरस्कृत भक्तों को भी राजाओं के समान सम्मान प्रदान करता है।

भक्ति परंपरा की सूची

अंतिम पंक्ति में नामदेव, कबीर, तिलोचन, सधना और सैन का उल्लेख है—ये सभी संत विभिन्न निम्न या हाशिये की जातियों (धोबी, जुलाहा, नाई आदि) से आए थे। रविदास इन्हें जीवंत उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं कि मुक्ति जन्म से नहीं, केवल सच्ची भक्ति से मिलती है।

गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान

यह भजन सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल है, जहाँ गुरुओं की रचनाओं के साथ-साथ 15 भक्तों (भगतों) की रचनाएँ भी संकलित हैं। इस समावेशन से सिख परंपरा की समतावादी दृष्टि स्पष्ट होती है, जो जाति-पाति के सारे भेदों को नकारती है।

Sant Namdev की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Sant Namdev

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