यह शबद संत रविदास जी द्वारा रचित है, जिसमें वे परमात्मा की महिमा का गुणगान करते हैं और बताते हैं कि वह दीन-दुखियों की रक्षा करते हैं तथा नीच को ऊँचा बनाते हैं।
यह रचना एक काल्पनिक शहर 'बेगम पुरा' का वर्णन करती है, जहाँ न कोई दुख है, न भय, न कर, और न कोई चिंता। यह मोक्ष या परम शांति की अवस्था का एक प्रतीकात्मक चित्रण है।
यह रचना भक्त रविदास की है, जिसमें वे अपनी नीच समझी जाने वाली जाति (चमार) का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि प्रभु के नाम का रस पीकर वे पवित्र हो गए हैं। वे समझाते हैं कि बाहरी तीर्थों और रीति-रिवाजों से नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति और संतों की संगति से ही संसार-सागर पार किया जा सकता है।