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Embroidered artwork for बेगमपुरा शहर को नाउ: Guru Ravidas seated by a river at dawn with one hand raised in blessing, embroidered

बेगमपुरा शहर को नाउ

बेगमपुरा शहर को नाउ

यह रचना एक काल्पनिक शहर 'बेगम पुरा' का वर्णन करती है, जहाँ न कोई दुख है, न भय, न कर, और न कोई चिंता। यह मोक्ष या परम शांति की अवस्था का एक प्रतीकात्मक चित्रण है।

श्लोक

बेगम पुरा शहिर को नाउ दूखु अंदोहु नहीं तिह ठाउ
Begam Pura Shahar Ko Naao Dukh Andoh Nahin Tih Thaao

श्लोक 1

ना तसवीस खराजु न मालु ख़उफु न ख़ता न तरसु जवालु
Na Tasvees Kharaj Na Maal Khauf Na Khata Na Taras Jawaal

श्लोक 2

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह रचना सिख धर्म के केंद्रीय ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब से ली गई है। परंपरागत रूप से इसे पाँचवें गुरु, गुरु अर्जन देव जी द्वारा रचित माना जाता है। यह एक शबद (भक्ति-गीत) है, जिसे अक्सर कीर्तन में गाया जाता है और एक ऐसे आध्यात्मिक शहर के रूप में ध्यान किया जाता है, जहाँ दुख, भय और करों जैसी सांसारिक बाधाएँ नहीं हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Bhagat Ravidas · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं–16वीं शताब्दी, वाराणसी

वाराणसी के एक कवि-संत एवं पेशे से चर्मकार, जिनकी वाणी ने बेगमपुरा — दुःख, भय एवं जातिगत विषमता से मुक्त एक आदर्श लोक — की कल्पना प्रस्तुत की। उनकी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं तथा आधुनिक रविदासिया परंपरा की भक्ति-आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

रचना और स्रोत

यह पंक्तियाँ गुरु अर्जन देव जी द्वारा रचित हैं, जो गुरु ग्रंथ साहिब में आसा राग (पृष्ठ ३४५) पर अंकित हैं। 'बेगमपुरा' शब्द फारसी के 'बे-ग़म' (बिना दुख) और संस्कृत के 'पुर' (शहर) से मिलकर बना है – यह एक आध्यात्मिक आदर्श नगरी का प्रतीक है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यह रचना तत्कालीन शासन-व्यवस्था के दौर में लिखी गई, जब कर (खराज), भय (ख़ौफ़) और दंड (ख़ता) आम जनता के लिए रोज़मर्रा की पीड़ा थे। गुरु जी ने एक ऐसे समाज की कल्पना की जहाँ न कोई राजस्व वसूली हो, न कोई डर, न कोई गलती की सज़ा – यह उस समय के शोषण के विपरीत एक क्रांतिकारी दृष्टि थी।

प्रतीकात्मक अर्थ

'बेगमपुरा' कोई भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि मन की वह अवस्था है जहाँ दुख, चिंता और भय का कोई स्थान नहीं। सिख धर्म में इसे 'सचखंड' (सत्य का क्षेत्र) के समान आध्यात्मिक मुक्ति का प्रतीक माना जाता है।

भाषा और शैली

गुरु जी ने पंजाबी और फारसी के मिश्रण में सरल, पर गहरी बात कही – 'बेगम', 'खराज', 'ख़ौफ़', 'ख़ता' जैसे फारसी शब्द आम लोगों की समझ में आते थे। यह रचना 'सलोक' शैली में है, जो छोटे, प्रभावशाली दोहों के रूप में होती है।

प्रभाव और विरासत

'बेगमपुरा' सिख इतिहास में एक न्यायपूर्ण समाज के आदर्श के रूप में स्मरण किया जाता है। बाद में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी कवियों और विचारकों ने इस प्रतीक का उपयोग एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना के लिए किया जहाँ कोई शोषण न हो।

Guru Ravidas Ji की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

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