भक्त रविदास की बाणी
मलार राग में सच्ची भक्ति का संदेश
यह रचना भक्त रविदास की है, जिसमें वे अपनी नीच समझी जाने वाली जाति (चमार) का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि प्रभु के नाम का रस पीकर वे पवित्र हो गए हैं। वे समझाते हैं कि बाहरी तीर्थों और रीति-रिवाजों से नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति और संतों की संगति से ही संसार-सागर पार किया जा सकता है।
श्लोक
मलार राग में तीसरे महले की वाणी है। नगर के लोग मेरी जाति को चमारन कहकर जानते हैं; पर मैं हरि-नाम में ही लीन रहती हूँ और राम-रस का आनंद चखती हूँ।
श्लोक 1
लोग गंगा को ‘गंगा! गंगा!’ करके बड़े जोर से पुकारते हैं; पर जो चार अक्षरों वाले नाम का जप करता है, वही कमल-रूपी उत्तम पुण्य-फल पाता है।
श्लोक 2
जब मन हरि के चरणों में मग्न हो जाता है, तब वह सत्संग में मिलकर भवसागर से पार उतर जाता है।
श्लोक 3
जिसके हृदय में गोबिंद बसते हैं, उसकी गति क्या कही जाए? वह बड़े भाग्य से इस जगत में अवतरित हुआ है और उसका कुल पवित्र हो गया है।
श्लोक 4
रविदास चमार की यह स्त्री तीनों लोकों से पार हो जाती है; नाम का स्मरण करते ही वह पवित्र हो गई और हरि के घर में भक्त बनकर स्थान पाया।
श्लोक 5
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह पद्य गुरु ग्रंथ साहिब में मलार राग के अंतर्गत संकलित है और भक्त कवि रविदास की वाणी है। रविदास (जिन्हें रैदास भी कहा जाता है) भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत थे, जिन्होंने जाति-पाति के भेदभाव को नकारते हुए प्रभु-भक्ति को सर्वोपरि बताया। इस बाणी का प्रयोग सिख धर्म में प्रार्थना और कीर्तन के समय किया जाता है, विशेषकर मलार राग के निर्धारित समय (बरसात के मौसम) में।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Bhagat Ravidas · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं–16वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक कवि-संत एवं पेशे से चर्मकार, जिनकी वाणी ने बेगमपुरा — दुःख, भय एवं जातिगत विषमता से मुक्त एक आदर्श लोक — की कल्पना प्रस्तुत की। उनकी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं तथा आधुनिक रविदासिया परंपरा की भक्ति-आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
रचना और संदर्भ
यह शब्द गुरु अमरदास जी (महला 3) द्वारा राग मलार में रचा गया है। इसमें उन्होंने संत रविदास जी की महिमा का गुणगान किया है, जो चमार जाति से थे लेकिन अपनी भक्ति से तीनों लोकों को पार कर गए।
चार अक्षरों का नाम
'चारि अखर' का अर्थ है प्रभु का चार अक्षरों वाला नाम (जैसे 'राम' या 'हरि')। इस नाम का जप करने से मनुष्य पवित्र हो जाता है और उसे 'कौल' (मोक्ष या ईश्वर का वचन) प्राप्त होता है।
जाति और लिंग का भेद मिटाना
गुरु अमरदास जी ने स्पष्ट किया कि भक्ति के मार्ग में जाति और लिंग बाधा नहीं बन सकते। रविदास जी चमार थे और इस शब्द में उन्हें 'इस्त्री' (नारी) भी कहा गया है, फिर भी वे नाम-स्मरण के बल पर तीनों लोकों को तार गए।
सत्संगति का महत्व
दूसरे छंद में कहा गया है कि जब मन हरि के चरणों में मग्न हो जाता है, तो सत्संगति (संतों की संगति) में मिलकर ही भवसागर से पार उतरा जा सकता है। यह संगति ही मोक्ष का सीधा मार्ग प्रशस्त करती है।
Guru Ravidas Ji
रविदासिया धर्म से और
संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
