Bharat Devotion
Embroidered artwork for मिट्टी का पुत्र: माया का भ्रम: Guru Ravidas seated by a river at dawn with one hand raised in blessing, embroidered

मिट्टी का पुत्र

माया का भ्रम

मिट्टी का पुत्र

माया का भ्रम

यह रविदास जी का एक भक्ति पद है, जो मिट्टी के बने मानव शरीर की नश्वरता और माया के मोह को समझाता है।

श्लोक

आसा मटी को पुतरा कैसे नचत है देखै देख सुनै बउराइआ कह ते आइआ कहा समाइआ १ रहाउ
Aasaa. Matee Ko Putra Kaise Nachat Hai. Dekhai Dekh Sunai Bauraaiya. Kah Te Aaiya Kaha Samaaiya.

श्लोक 1

जउ किछु पावै तउ गरबु करावै माइआ मिली तब होइ रहावै जब कछु बिछुरत तउ रोवन लागै लापत लापत अंति बिछारै १
Jau Kichh Paavai Tau Garb Karaavai. Maaiya Mili Tab Hoi Rahaavai. Jab Kachh Bichhurat Tau Rovan Laagai. Laapat Laapat Ant Bichhaarai.

श्लोक 2

कहत रविदास भ्रमु न निवरै जैसे सुपनै रैनि बिसरै २४
Kahat Ravidaas Bhram Na Nivarai. Jaise Supnai Rain Bisarai.

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह पद गुरु ग्रंथ साहिब में राग आसा में दर्ज है, जो भक्त रविदास की वाणी है। गुरु ग्रंथ साहिब सिख धर्म का मुख्य ग्रंथ है, और रविदास जी पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के भक्ति संत थे। यह पद मनुष्य के शरीर और माया के भ्रम पर ध्यान दिलाने के लिए कथा या कीर्तन में गाया जाता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Bhagat Ravidas · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं–16वीं शताब्दी, वाराणसी

वाराणसी के एक कवि-संत एवं पेशे से चर्मकार, जिनकी वाणी ने बेगमपुरा — दुःख, भय एवं जातिगत विषमता से मुक्त एक आदर्श लोक — की कल्पना प्रस्तुत की। उनकी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं तथा आधुनिक रविदासिया परंपरा की भक्ति-आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

रचयिता और राग

यह शब्द संत रविदास (15वीं शताब्दी, काशी) का है, जो राग आसा में गाया जाता है—एक प्रातःकालीन राग जो वैराग्य और आत्मचिंतन को जगाता है।

मिट्टी के पुतले का रूपक

रविदास मानव शरीर को 'मिट्टी का पुत्र' (मटी को पुतरा) कहते हैं, जो अज्ञान में नाचता रहता है। रहाऊ (टेक) में पूछा गया है—यह कहाँ से आया और कहाँ समा जाएगा? यह जन्म-मरण के चक्र की ओर संकेत करता है।

माया के बंधन का चित्रण

जब कुछ पाता है तो अहंकार करता है, माया मिलने पर ठहराव महसूस करता है, और बिछुड़ने पर रोने लगता है। अंत में सब कुछ छोड़कर जाना पड़ता है—यह संसारिक आसक्ति का व्यर्थ नाच है।

स्वप्न का दृष्टांत

रविदास कहते हैं कि यह भ्रम (भ्रम्) कभी दूर नहीं होता, जैसे रात का सपना जागने पर मिट जाता है। इसका अर्थ है कि आत्मज्ञान के बिना माया का मोह कभी नहीं टूटता।

ग्रंथ में स्थान

यह शब्द गुरु ग्रंथ साहिब में अंकित है (राग आसा, रविदास की वाणी, अंग ४८३), और इसके अंत में '੨॥੪॥' (दूसरा अध्याय, चौथा शबद) दिया गया है। यह संकेत करता है कि बिना आध्यात्मिक जागृति के यह भ्रम चक्र चलता रहता है।

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Guru Ravidas Ji

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