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Embroidered artwork for ऐसी लगी लगन: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

ऐसी लगी लगन

ऐसी लगी लगन

यह एक भक्ति-गीत है जो मीरा बाई के कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि कैसे मीरा ने महलों का सुख छोड़कर, संतों के संग रहकर और हरि-नाम का सुमिरन करते हुए अपना जीवन प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया।

श्लोक

है आँख वो जो श्याम का दर्शन किया करे है शीश, जो प्रभु चरण में वंदन किया करे बेकार वो मुख है जो रहे व्यर्थ बातों में मुख वो है जो हरि नाम का सुमिरन किया करे
Hai aankh vo jo Shyam ka darshan kiya kare Hai sheesh, jo Prabhu charan mein vandan kiya kare Bekaar vo mukh hai jo rahe vyarth baaton mein Mukh vo hai jo Hari naam ka sumiran kiya kare

श्लोक 1

हीरे-मोती से नहीं शोभा है हाथ की, जो भगवान का पूजन किया करे मर कर भी अमर नाम है उस जीव का, जग में प्रभु प्रेम में बलिदान जो जीवन किया करे
Heere-moti se nahin shobha hai haath ki Hai hāth, jo Bhagwan ka poojan kiya kare Mar kar bhi amar naam hai us jeev ka jag mein Prabhu prem mein balidan jo jeevan kiya kare

श्लोक 2

ऐसी लगी लगन मीरा हो गई मगन वो तो गली-गली हरि गुण गाने लगी ऐसी लगी लगन मीरा हो गई मगन वो तो गली-गली हरि गुण गाने लगी महलों में पली, बन के जोगन चली मीरा रानी दीवानी कहाने लगी ऐसी लगी लगन मीरा हो गई मगन
Aisi lagi lagan Meera ho gayi magan Vo to gali-gali Hari gun gaane lagi Aisi lagi lagan Meera ho gayi magan Vo to gali-gali Hari gun gaane lagi Mehalon mein pali, ban ke jogan chali Meera rani deewani kahaane lagi Aisi lagi lagan Meera ho gayi magan

श्लोक 3

कोई रोके नहीं, कोई टोके नहीं मीरा गोविंद-गोपाल गाने लगी
Koi roke nahin, koi toke nahin Meera Govind-Gopal gaane lagi Koi roke nahin, koi toke nahin Meera Govind-Gopal gaane lagi

श्लोक 4

बैठी संतों के संग, रंगी मोहन के रंग मीरा प्रेमी-प्रीतम को मनाने लगी वो तो गली-गली हरि गुण लगी
Baithi santon ke sang, rangi Mohan ke rang Meera premi-preetam ko manane lagi Vo to gali-gali Hari gun lagi

श्लोक 5

ऐसी लगी लगन मीरा हो गयी मगन वो तो गली-गली हरि गुण गाने लगी महलों में पली, बन के जोगन चली मीरा रानी दीवानी कहाने लगी ऐसी लगी लगन मीरा हो गयी मगन
Aisi lagi lagan Meera ho gayi magan Vo to gali-gali Hari gun gaane lagi Mehalon mein pali, ban ke jogan chali Meera rani deewani kahaane lagi Aisi lagi lagan Meera ho gayi magan

श्लोक 6

राणा ने विष दिया, मानो अमृत पिया मीरा सागर में सरिता समाने लगी
Rana ne vish diya, mano amrit piya Meera sagar mein sarita samane lagi Rana ne vish diya, mano amrit piya Meera sagar mein sarita samane lagi

श्लोक 7

दुख लाखों सहे, मुख से "गोविंद" कहे मीरा गोविंद-गोपाल गाने लगी वो तो गली-गली हरि गुण गाने लगी
Dukh lakhon sahe, mukh se "Govind" kahe Meera Govind-Gopal gaane lagi Vo to gali-gali Hari gun gaane lagi

श्लोक 8

ऐसी लगी लगन मीरा हो गई मगन वो तो गली-गली हरि गुण गाने लगी महलों में पली, बन के जोगन चली मीरा रानी दीवानी कहाने लगी ऐसी लगी लगन मीरा हो गई मगन
Aisi lagi lagan Meera ho gayi magan Vo to gali-gali Hari gun gaane lagi Mehalon mein pali, ban ke jogan chali Meera rani deewani kahaane lagi Aisi lagi lagan Meera ho gayi magan

श्लोक 9

ऐसी लगी लगन मीरा हो गई मगन
Aisi lagi lagan Meera ho gayi magan Aisi lagi lagan Meera ho gayi magan

श्लोक 10

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति

पृष्ठभूमि

यह भजन भक्ति-परंपरा के अंतर्गत आता है, जो १६वीं शताब्दी की संत-कवयित्री मीरा बाई की भक्ति-भावना से जुड़ा है। मीरा का कृष्ण-प्रेम इतना गहरा था कि वे सांसारिक बंधनों को छोड़कर गली-गली में हरि-गुण गाने लगीं। यह भजन प्रायः भक्ति-सभाओं, कीर्तनों और मंदिरों में गाया जाता है, जहाँ श्रोता मीरा के समर्पण और प्रभु-प्रेम की इस पागलपन भरी लगन से प्रेरित होते हैं।

क्या आप जानते हैं?

भक्ति परंपरा

मीरा बाई 16वीं सदी की राजपूत राजकुमारी और कृष्ण की परम भक्त थीं। उन्होंने राजसी जीवन छोड़कर भक्ति का मार्ग अपनाया और 'जोगन' (त्यागिनी) बनकर गली-गली हरि गुण गाने लगीं। यह भजन उनकी उसी निर्भीक और मग्न भक्ति को दर्शाता है।

विष-अमृत प्रसंग

इस भजन में विष दिए जाने का उल्लेख है—यह मीरा के जीवन की एक प्रसिद्ध परंपरागत घटना है। कहा जाता है कि उन्होंने उसे कृष्ण का प्रसाद मानकर पी लिया और वह उनके लिए अमृत बन गया। यह उनकी अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।

भाषा और शैली

यह भजन ब्रजभाषा और राजस्थानी के मिश्रण में रचा गया है, जो मीरा की रचनाओं की विशेषता है। इसमें 'गली-गली हरि गुण गाने' और 'महलों में पली, बन के जोगन चली' जैसी पंक्तियाँ उनके जीवन के विरोधाभास—राजसी ठाठ से त्याग की ओर—को सरलता से चित्रित करती हैं।

भक्ति का उन्माद

'मीरा रानी दीवानी कहाने लगी'—यह पंक्ति उनके प्रेम-उन्माद को दर्शाती है, जिसे भक्ति परंपरा में 'मदन' या दिव्य प्रेम का रूप माना जाता है। मीरा को 'दीवानी' कहकर समाज ने उनका मजाक उड़ाया, पर वे इसे अपनी पहचान बनाकर निर्भय होकर गाती रहीं।

संतों का संग

'बैठी संतों के संग, रंगी मोहन के रंग'—मीरा ने राजसी जीवन छोड़कर संतों की संगति को अपनाया। यह भक्ति आंदोलन की एक प्रमुख विशेषता थी, जहाँ जाति-पाँति से ऊपर उठकर प्रेम और भक्ति को ही सर्वोपरि माना गया। मीरा ने इसी मार्ग पर चलकर अपने 'प्रीतम' (कृष्ण) को मनाया।

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