बसो मोरे नैनन में नंदलाल
यह एक भक्ति गीत है जिसमें मीरा बाई भगवान कृष्ण से अपनी आँखों में बसने की प्रार्थना करती हैं और उनकी मनमोहक सुंदरता का वर्णन करती हैं।
श्लोक
मेरे नेत्रों में नंदलाल विराजमान हों।
श्लोक 1
मोहक मूर्ति, साँवली छवि, नेत्र बड़े-बड़े हैं।
श्लोक 2
अधरों में सुधारस, मुरली शोभित है, वक्ष पर बैजंती माला।
श्लोक 3
कमर पर छोटी घंटियाँ सुशोभित हैं, पैरों में मधुर ध्वनि वाले नूपुर।
श्लोक 4
मीरा के प्रभु, संतों को सुख देने वाले, भक्तवत्सल गोपाल।
श्लोक 5
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला
तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन
- परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति
पृष्ठभूमि
यह पद मीरा बाई द्वारा रचित भक्ति कविता का हिस्सा है, जो 16वीं शताब्दी की एक प्रसिद्ध संत-कवयित्री थीं। यह गीत कृष्ण भक्ति परंपरा से जुड़ा है और अक्सर भजन संध्या या कीर्तन में गाया जाता है। मीरा बाई ने अपनी रचनाओं में भगवान कृष्ण के प्रति अपने गहरे प्रेम और समर्पण को व्यक्त किया है। मीरा जिस रूप का ध्यान करती हैं, अधरों के सुधारस से भरी मुरली और वक्ष पर वैजयंती माला, वह श्रीमद्भागवत महापुराण (10.21.5) में वृंदावन के वन में प्रवेश करते श्रीकृष्ण के उस चित्र से मेल खाता है जिसमें वे वैजयंती माला धारण किए हैं और अपनी मुरली को अधरों के अमृत से भरते हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Mirabai · मध्यकालीन भक्ति कवयित्री · 16वीं शताब्दी, राजस्थान
मेवाड़ की एक राजपूत राजकुमारी, जिन्होंने राजदरबार का जीवन त्यागकर स्वयं को पूर्णतः कृष्ण को समर्पित कर दिया, जिन्हें वे अपना वास्तविक पति मानती थीं। उनके भावप्रवण भजन, जो आज भी उत्तर भारत में गाए जाते हैं, अपने राजघराने की सामाजिक अपेक्षाओं के विरुद्ध प्रायः निर्भीक, अत्यंत निजी शब्दों में दिव्य प्रेम का वर्णन करते हैं।
क्या आप जानते हैं?
रचयिता
यह भजन 16वीं शताब्दी की कृष्ण-भक्त कवयित्री मीरा बाई द्वारा रचित है। मीरा ने अपने जीवन को श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित कर दिया था और उनकी रचनाएँ प्रेम-भक्ति का अद्भुत उदाहरण हैं।
केंद्रीय भाव
इस भजन में मीरा श्रीकृष्ण से विनती करती हैं कि वे उनके नेत्रों में बस जाएँ। यह आत्म-समर्पण और ईश्वर को सदा अपने अनुभव में रखने की गहरी लालसा को दर्शाता है।
शब्द-चित्रण
मीरा ने कृष्ण के रूप का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है—साँवला रंग, बड़े-बड़े नेत्र, अधरों पर बाँसुरी, वक्ष पर वैजयंती माला, कमर पर घुंघरू और पैरों में नूपुर। यह ब्रजभाषा में रचित एक सुंदर दृश्य-काव्य है।
भाषा और शैली
यह भजन ब्रजभाषा में लिखा गया है, जो उत्तर भारत की एक लोकभाषा है और कृष्ण-भक्ति काव्य में विशेष स्थान रखती है। ‘अधर सुधारस’ जैसी शब्दावली कृष्ण की मुरली के मधुर रस को रूपक रूप में प्रस्तुत करती है।
अर्थ और महत्त्व
‘भगत बछल’ (भक्तों पर स्नेह रखने वाले) और ‘संतन सुखदाई’ (संतों को सुख देने वाले) पदों से मीरा कृष्ण के उस दिव्य स्वभाव को उजागर करती हैं, जो अपने भक्तों पर सदैव कृपा बरसाते हैं। यह भजन न केवल प्रेम की अभिव्यक्ति है, बल्कि ईश्वर की सर्वव्यापकता का भी बोध कराता है।
Krishna
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