कबीर का भजन
झीनी झीनी बीनी चदरिया
यह कबीर का प्रसिद्ध भजन है, जिसमें मानव शरीर को एक सुंदर चद्दर (वस्त्र) के रूप में देखा गया है। यह चद्दर योग की नाड़ियों, पाँच तत्त्वों और आठ कमल-दलों से बुनी गई है, और इसे बिना मैला किए (अर्थात सांसारिक विकारों से बचाकर) रखना ही जीवन की सफलता है।
श्लोक
अत्यंत पतली और बारीक बुनी हुई वह चादर (शरीर या आत्मा का आवरण) है।
श्लोक 1
किस ताने से और किस भरनी (बाने) से बनी है? किस सूत्र से यह चादर बुनी गई है?
श्लोक 2
इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ताना-बाना हैं, और सुषुम्ना नाड़ी का सूत्र इसे बुनता है।
श्लोक 3
आठ कमलदलों का चरखा घूमता है, और पाँच तत्वों तथा तीन गुणों से यह चादर बुनी गई है।
श्लोक 4
इसे सीने में दस महीने लगे, और बार-बार ठोंक-पीटकर यह चादर बुनी गई।
श्लोक 5
उस चादर को देवता, मनुष्य और मुनि ओढ़ते हैं, पर ओढ़कर उन्होंने इसे मैला कर दिया।
श्लोक 6
दास कबीर ने बड़े यत्न से इसे ओढ़ा और ज्यों-की-त्यों (बिना मैला किए) इसे सँभाल कर रख दिया।
श्लोक 7
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह भजन 15वीं शताब्दी के महान संत-कवि कबीर को परंपरागत रूप से श्रेय दिया जाता है। यह भारतीय भक्ति और संत परंपरा का एक अमूल्य रत्न है, जिसे प्रायः भजन-संध्या, सत्संग और ध्यान के समय गाया जाता है। कबीर ने इस पद में शरीर को एक चद्दर (वस्त्र) के रूप में रूपकित किया है, जो ब्रह्मांडीय शक्तियों (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ियों, आठ कमल-दल, पाँच तत्त्व) से बुनी गई है। इस चद्दर को मैला किए बिना (अर्थात माया और विकारों से दूर रहकर) ज्यों-का-त्यों रखना ही आत्मा का लक्ष्य बताया गया है। कविता कोश में यह कबीर के भजनों में सूचीबद्ध है, 'बीजक' या 'कबीर ग्रंथावली' वाले खंडों में नहीं। इस पद में छह पद-बंध हैं, और छपे तथा गाए जाने वाले रूपों में शब्दों का थोड़ा भेद मिलता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।
क्या आप जानते हैं?
चदरिया का अर्थ
यह 'चदरिया' मानव शरीर का प्रतीक है, जिसे परमात्मा ने बड़ी सूक्ष्मता से बुना है। कबीर इस रूपक के ज़रिए बताते हैं कि शरीर एक अस्थायी वस्त्र है, जिसे हमें सावधानी से पहनना और अंत में निर्मल लौटाना है।
तीन नाड़ियाँ
इडा (बाएँ), पिंगला (दाएँ) और सुषुम्ना (बीच) — ये शरीर की तीन प्रमुख ऊर्जा नाड़ियाँ हैं। कबीर कहते हैं कि इडा और पिंगला ताना-भरनी (आड़े-सीधे धागे) हैं, जबकि सुषुम्ना वह तार है जिससे यह चदरिया बुनी गई है।
शरीर की संरचना
'आठ कँवल दल' आठ चक्रों (कमल के फूलों) को दर्शाता है, 'पाँच तत्त्व' (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और 'तीन गुन' (सत, रज, तम) — ये सब मिलकर इस शरीर-रूपी चदरिया को बुनते हैं।
गर्भकाल का संकेत
'साँ को सियत मास दस लागे' — इस पंक्ति में कबीर गर्भ के दस महीने की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं कि यह चदरिया दस महीने तक सँवारी और ठोंक-ठोंक कर बुनी गई, यानी मानव जन्म अत्यंत सावधानी और समय से तैयार होता है।
कबीर की उपलब्धि
देवता, मुनि और ऋषि भी इस चदरिया को ओढ़कर मैला कर देते हैं, लेकिन कबीर कहते हैं कि उन्होंने इसे यत्न से ओढ़ा और ज्यों-की-त्यों धर दिया — यानी शरीर को साधना के द्वारा विकारों से बचाकर, मूल रूप में ही परमात्मा को समर्पित कर दिया।
Sant Kabir
कबीर पंथ से और
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