घट
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
घड़ा; शरीर
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'घट' (घड़ा, पात्र); कबीर का मानव शरीर हेतु सामान्य प्रतीक, दिव्यता को धारण करने वाला मिट्टी का पात्र, उनकी सबसे प्रसिद्ध पंक्ति में प्रयुक्त कि ईश्वर घट में ही निवास करता है, दूर के तीर्थस्थलों में नहीं।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
'मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में' — कबीर की घट शिक्षा साधक की दृष्टि को बाह्य मंदिरों व तीर्थस्थलों से पुनः उसके अपने शरीर-पात्र की ओर मोड़ती है।