कर्मकांड खंडन
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
खोखले कर्मकांड का खंडन
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
'कर्मकांड' (रस्मी पूजा विधियाँ) और 'खंडन' (नकारना) से बना; गुरु रविदास जी द्वारा सच्ची श्रद्धा के बिना किए जाने वाले बाह्य कर्मकांडों — तीर्थ, व्रत, यज्ञ — की निरंतर आलोचना।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
यह खंडन भक्ति अभ्यास को नकारता नहीं, बल्कि उसे हृदय की सच्ची लगन की ओर पुनः मोड़ता है — बाहरी दिखावे के बजाय आंतरिक ईमानदारी को प्राथमिकता देता है।