मनुष्य की जात
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
मनुष्य की जाति (सभी एक समान)
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
गुरु रविदास जी की केंद्रीय शिक्षा से लिया गया वाक्यांश कि सच्ची पहचान जन्म की जाति नहीं, बल्कि मानवता की साझी जाति है — प्रत्येक व्यक्ति उत्पत्ति में समान रूप से दिव्य।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
गुरु रविदास जी स्वयं एक चमार परिवार में जन्मे थे, जिस समय इस पेशे को निम्न माना जाता था — उनकी शिक्षा उनके स्वयं के जीवन से निकली, किसी सैद्धांतिक बहस से नहीं।