पद्यानि
शान्ति पाठ: ॐ! हे देवगण! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें; हे पूजनीय देवों! हम अपनी आँखों से शुभ और कल्याणमय दृश्य देखें। सुदृढ़ अंगों और स्वस्थ शरीर से आपकी स्तुति करते हुए हम ईश्वर द्वारा निर्धारित पूर्ण आयु का उपभोग करें। हमारा मन सदा शुभ विचारों से युक्त रहे। ॐ शांति, शांति, शांति।
श्लोकः 1
हरिः ॐ! यह 'ॐ' अक्षर ही सब कुछ है; यह संपूर्ण जगत उसी का विस्तार और व्याख्या है। जो कुछ भूतकाल में था, जो वर्तमान में है और जो भविष्य में होगा—वह सब ओंकार ही है। और जो कुछ इन तीनों कालों से अतीत है, वह भी केवल ओंकार ही है।
श्लोकः 1
निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म ही है। यह अंतःस्थित आत्मा भी ब्रह्म ही है। यह आत्मा चार चरणों (पादों/अवस्थाओं) वाला है।
श्लोकः 2
जाग्रत अवस्था में स्थित, बाहर के विषयों को जानने वाली चेतना वाला, सात अंगों और उन्नीस मुखों वाला, तथा स्थूल विषयों का उपभोग करने वाला 'वैश्वानर' आत्मा का प्रथम पाद (चरण) है।
श्लोकः 3
स्वप्न अवस्था में स्थित, भीतर के मनोमय संसार को जानने वाली चेतना वाला, सात अंगों और उन्नीस मुखों वाला, तथा सूक्ष्म संस्कारों का अनुभव करने वाला 'तैजस' आत्मा का द्वितीय पाद है।
श्लोकः 4
जिस अवस्था में सोता हुआ मनुष्य न किसी भोग की इच्छा करता है और न कोई स्वप्न देखता है, वह 'सुषुप्ति' (गाढ़ निद्रा) है। उस सुषुप्ति अवस्था में स्थित, भेदरहित होकर एकाकार हुआ, केवल ज्ञान का घनीभूत स्वरूप, आनंदमय, आनंद का ही भोग करने वाला, और चैतन्य ही जिसका मुख है—वह 'प्राज्ञ' आत्मा का तीसरा पाद है।
श्लोकः 5
यह (प्राज्ञ अवस्था) ही सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबके अंतःकरण में वास करने वाला अंतर्यामी है, यह समस्त जगत की उत्पत्ति का मूल कारण है, और यही सभी प्राणियों की उत्पत्ति तथा लय का स्थान है।
श्लोकः 6
वह 'तुरीय' (चौथा परम पाद) न अंतःप्रज्ञ (स्वप्नद्रष्टा) है, न बहिष्प्रज्ञ (जाग्रतद्रष्टा) है, न दोनों अवस्थाओं का ज्ञाता है, न प्रज्ञानघन (सुषुप्ति) है, न साधारण ज्ञान रूप है और न अचेतन है। वह इंद्रियों से देखा नहीं जा सकता, व्यवहार में नहीं लाया जा सकता, ग्रहण नहीं किया जा सकता, उसका कोई भौतिक लक्षण नहीं है, वह अचिंत्य और अनिर्वचनीय है। केवल एक अद्वितीय आत्म-चेतना ही उसका सार है। समस्त प्रपंच का उपशम, परम शांत, परम कल्याणमय (शिव) और अद्वैत स्वरूप—उसे ही चौथा तत्व माना जाता है। वही वास्तविक आत्मा है, और उसी का साक्षात् बोध प्राप्त करना चाहिए!
श्लोकः 7
यह आत्मा ही अक्षरों की दृष्टि से 'ॐ' है। मात्राओं की दृष्टि से आत्मा के जो चार चरण हैं, वे ही ओंकार की मात्राएँ हैं, और जो ओंकार की मात्राएँ हैं, वे ही आत्मा के चरण हैं—अर्थात् 'अ' कार, 'उ' कार और 'म' कार।
श्लोकः 8
जाग्रत अवस्था में रहने वाला 'वैश्वानर' ओंकार की पहली मात्रा 'अ' है, क्योंकि यह सर्वव्यापक (आप्ति) है और समस्त ध्वनियों का आदि (प्रारंभ) है। जो इस रहस्य को जान लेता है, वह अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है और श्रेष्ठ बन जाता है।
श्लोकः 9
स्वप्न अवस्था में स्थित 'तैजस' ओंकार की दूसरी मात्रा 'उ' है, क्योंकि यह 'अ' और 'म' के मध्य में स्थित होकर उत्कर्ष को प्राप्त कराता है। जो इस सत्य को जानता है, उसकी ज्ञान-परंपरा उत्कर्ष को प्राप्त होती है, वह समदर्शी हो जाता है और उसके कुल में कोई ब्रह्मज्ञान से विमुख नहीं होता।
श्लोकः 10
सुषुप्ति अवस्था में रहने वाला 'प्राज्ञ' ओंकार की तीसरी मात्रा 'म' है, क्योंकि यह मानो समस्त प्रपंच को अपने भीतर समेटकर नाप (मिति) लेता है और उसमें सब कुछ लीन (अपीति) हो जाता है। जो इसे जानता है, वह इस समस्त जगत के यथार्थ को जान लेता है और ब्रह्ममय हो जाता है।
श्लोकः 11
जो ध्वनि-मात्रा से रहित (अमात्र), व्यवहार से परे, समस्त द्वैत प्रपंच का उपशम, साक्षात् कल्याणकारी और अद्वैत है—वही 'तुरीय' चौथा पाद है। इस प्रकार ओंकार ही साक्षात् आत्मा है। जो इस सत्य को जान लेता है, वह अपनी जीवात्मा को परमात्मा में सर्वथा लीन कर लेता है।
श्लोकः 12
पूजाविधिः फलश्रुतिश्च (पाठलाभाः)
फलश्रुतिःप्रतिदिनं अथवा शुभतिथौ
ब्राह्मे मुहूर्ते सन्ध्याकाले च
घृतदीपः, धूपः, शुद्धपुष्पं, जलं च
- मानसिकशान्तिः, आत्मोन्नतिः, मङ्गलमयवातावरणम्
पृष्ठभूमिः
मुक्तिकोपनिषदि भगवान् श्रीरामः श्रीहनुमन्तम् उपदिशति—'मुमुक्षूणां विमुक्तये माण्डूक्यम् एकमेव अलम्' (माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये) इति। आचार्यः गौडपादः एतं संक्षिप्तं ग्रन्थं स्वीकृत्य स्वां महतीं माण्डूक्यकारिकां रचयित्वा व्यवस्थितम् अद्वैतदर्शनं प्रतिष्ठापितवान्। स्थाननिर्देशः—अथर्ववेदपरम्परा; मुक्तिकासंग्रहस्य 108 उपनिषदां मध्ये षष्ठी; द्वादशमन्त्रात्मकः एकः लघुः ग्रन्थः (अध्यायः 1, मन्त्राः 1-12), अत्र शान्तिपाठपूर्वकं प्रस्तुतः। अधस्तनाः मन्त्रक्रमाङ्काः (तुरीयविषये मन्त्रः 7, मौनस्य अमात्रस्य ओंकारस्य विषये मन्त्रः 12) पारम्परिकगणनाम् अनुसरन्ति। गौडपादस्य चतुःप्रकरणात्मिका कारिका पृथग्ग्रन्थः, एतेषु श्लोकेषु न अन्तर्भवति।
ज्ञातव्य-विशेषः
'माण्डूक्यमेकमेवालम्' इत्यस्य महत्ता
मुक्तिकोपनिषदि भगवान् श्रीरामः स्पष्टं घोषयति यत् मोक्षाभिलाषिणां साधकानां कृते केवलं माण्डूक्योपनिषदः सम्यग्ज्ञानमेव भवबन्धच्छेदने पूर्णतः समर्थम् अस्ति।
ओंकारस्य त्रिविधं स्वरूपम् (अ-उ-म)
ओंकारस्य त्रयः वर्णाः मानवचेतनायाः त्रीन् स्तरान् प्रकटयन्ति—'अ' स्थूलजागरितजगतः (वैश्वानरः), 'उ' सूक्ष्मस्वप्नलोकस्य (तैजसः), 'म' कारणसुषुप्तेः (प्राज्ञः) प्रतीकम् अस्ति।
अमात्रं शान्तं तुरीयं च (मन्त्रः १२)
ओंकारस्य यथार्थं रहस्यम् उच्चारणोत्तरं मौनम् (अमात्रम्) अस्ति—सा शान्ता निराकारा च पृष्ठभूमिः, यस्यां सर्वाणि शब्दाः विचाराश्च उत्पद्य विलीयन्ते; एतत् तुरीयस्य प्रतीकम् अस्ति।
तुरीयस्य 'नेति-नेति' मीमांसा (मन्त्रः ७)
विश्वदर्शने मन्त्रः ७ अद्वैतचेतनायाः सर्वोच्चं व्याख्यानं मन्यते, यत्र शुद्धात्मा सर्वेभ्यः लौकिकद्वैतेभ्यः सीमाभ्यश्च परः इति सिध्यति।
गौडपादाचार्यस्य 'अजातिवादः'
माण्डूक्योपनिषदाधारिता गौडपादस्य माण्डूक्यकारिका अद्वैतदर्शने 'अजातिवादं' स्थापितवती—परमसत्ये कदापि काचन उत्पत्तिः विकारो वा नाभवत्; अखण्डा आत्मचेतनैव सत्यम् इति।
विषयानुसारं अन्वेषयतु
Rama
हिन्दूधर्मःतः अधिकम्
सर्वं पश्यतसम्बद्धशिक्षाः
सैव शिक्षा, विविधपरम्परासु प्रतिध्वनिता
