गगन
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
आकाश; आंतरिक स्थान
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'गगन' (आकाश, आकाशतत्व) से; कबीर की योगिक-भक्ति कल्पना में, सामान्य मानसिक गतिविधि से ऊपर स्थित विशाल आंतरिक आकाश, जहाँ अनहद नाद गूँजता माना जाता है।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
'गगन में आवाज़ हो रही है' — कबीर का गगन साधक को याद दिलाता है कि दिव्य पुकार दूर नहीं बल्कि भीतर निरंतर गूँज रही है, केवल ध्यान दिए जाने की प्रतीक्षा में।