तप
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
तपस्या
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'तप्' (तपाना, जलना) से; जैन धर्म में कर्मों को 'जलाने' की बाह्य तथा आंतरिक विधि, बारह प्रकारों में विभाजित — छह बाह्य, छह आंतरिक।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
उपवास जैसे बाह्य तप से भी अधिक, जैन धर्म क्षमा (प्रायश्चित), विनम्रता (विनय) जैसे आंतरिक तप को अधिक कठिन तथा मूल्यवान मानता है।