गाथा
नाग वर्ग: गज-तुल्य सहनशीलता, आत्म-दमन और एकांत (गाथा 320–333)
नाग वर्ग में 14 भव्य गाथाएँ (320–333) संगृहीत हैं, जिनमें महान हस्ति (नाग/गजराज) को आध्यात्मिक तितिक्षा (सहनशीलता), मन के दमन और एकांत साधना के जीवंत प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अध्याय का प्रारंभ तथागत के इस उद्घोष से होता है: 'जैसे संग्राम में हाथी धनुष से छूटे बाणों को सहता है, वैसे ही मैं कटु वचनों को सहन करूँगा; क्योंकि अधिकांश संसारी जन असंयत और दुर्विनीत होते हैं।' स्वयं को वश में करने वाले साधक को प्रशिक्षित घोड़ों और राजसी हाथियों से भी श्रेष्ठ बताया गया है। गाथा 328 से 330 में संगति का अमर सिद्धांत है: यदि कोई बुद्धिमान और सदाचारी साथी मिले तो उसके साथ आनंदपूर्वक चलो; किंतु यदि ऐसा श्रेष्ठ साथी न मिले, तो राज्य छोड़कर अकेले विचरण करने वाले राजा अथवा मातंग वन के एकांत हाथी की भाँति अकेले चलो, मूर्ख की संगति कभी मत करो।
14 verses