वर्ष का सबसे पवित्र जैन पर्व — आठ से दस दिनों का उपवास, शास्त्र-अध्ययन तथा आत्म-चिंतन, जो संवत्सरी तथा सार्वभौमिक क्षमा-याचना 'मिच्छामि दुक्कडम्' में परिणत होता है।