यह एक भक्ति पद है जो चैतन्य महाप्रभु (गौरांग) के चरणों की महिमा का वर्णन करता है। इसमें बताया गया है कि जो गौरांग के नाम और लीला में लीन होता है, उसे प्रेम भक्ति प्राप्त होती है और वह राधा-कृष्ण की नित्य लीला का अधिकारी बनता है।