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Embroidered artwork for उत्तरकाशी एवं काशी विश्वनाथ: शिव की उत्तरी पावन पीठ: A yogi in lotus pose on a rock beside a mountain lake at sunrise, in embroidery

उत्तरकाशी एवं काशी विश्वनाथ

शिव की उत्तरी पावन पीठ

उत्तरकाशी एवं काशी विश्वनाथ

शिव की उत्तरी पावन पीठ

सौम्य काशी उत्तरकाशी भागीरथी तट पर शिव-तपस्या की शांत पीठ है, जहाँ काशी विश्वनाथ मंदिर और महान त्रिशूल पूजित हैं।

संक्षिप्त तीर्थ मार्गदर्शिका (एक दृष्टि में)

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    यह क्या है: शास्त्रों में ‘सौम्य काशी’ के नाम से प्रसिद्ध उत्तरकाशी, देवाधिदेव महादेव की पावन तपोभूमि तथा वाराणसी (काशी) की उत्तर दिशा में स्थित दिव्य पीठ है। यहाँ प्राचीन श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर में स्वयंभू शिवलिंग तथा सम्मुख जगन्माता का अभेद्य शक्ति त्रिशूल प्रतिष्ठित है।
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    दर्शन व जप का फल: यह क्षेत्र मौन जप, योग, प्राणायाम तथा वेदान्त ‘श्रवण-मनन’ के लिए विश्वप्रसिद्ध है। यहाँ की साधना मन को स्थिर करने में सहायक मानी जाती है।
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    कब जाएं: तीर्थ वर्षभर खुला रहता है। यात्रा के लिए सर्वोत्तम समय अप्रैल से जून (ग्रीष्मकाल) और सितंबर से नवंबर (शरद ऋतु) है। महाशिवरात्रि तथा श्रावण मास में यहाँ अलौकिक भक्ति उत्सव होता है।
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    कहाँ: उत्तरकाशी जिला, गढ़वाल हिमालय, उत्तराखण्ड; लगभग 1,165 मीटर की ऊँचाई पर पवित्र भागीरथी गंगा के पावन तट पर स्थित। निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश/देहरादून तथा हवाई अड्डा जौलीग्रांट (देहरादून) है।
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    विधि एवं नियम:
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    मणिकर्णिका घाट या वरुणा के संगम पर पवित्र गंगा स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
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    गर्भगृह में पारंपरिक मर्यादा का पालन करते हुए प्रवेश करें (पुरुषों हेतु धोती/कुर्ता, महिलाओं हेतु साड़ी/सूट)।
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    स्वयंभू शिवलिंग पर भागीरथी जल, श्वेत चंदन, भस्म और बिल्वपत्र अर्पित करें।
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    मंदिर के सम्मुख स्थित शक्ति मंदिर में भगवती के महात्रिशूल पर कुमकुम अर्पित कर नमन करें।
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    मंदिर प्रांगण में बैठकर ‘ॐ नमः शिवाय’ अथवा महामृत्युंजय मंत्र का मौन जप करें।

पावन उद्गम एवं पौराणिक परंपरा

स्कन्द पुराण के केदारखण्ड में संरक्षित परंपरा के अनुसार काशी की आध्यात्मिक आभा ‘सौम्य काशी’ अर्थात उत्तरकाशी में सुरक्षित रहती है। हिमालय की सुरम्य उपत्यका में स्थित यह तीर्थ अपने पावन भूगोल में वाराणसी की प्रतिध्वनि है। वरुणा और असि धाराएं भागीरथी गंगा में मिलती हैं। भगवान शिव यहाँ अपने ‘सौम्य’ एवं शांत तपस्वी भाव में विराजमान रहते हैं।

गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग है, जिसके स्वतः प्रकट होने की मान्यता है। स्थानीय परंपरा भगवान परशुराम को इस घाटी में तपस्या से जोड़ती है। विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने शक्ति मंदिर में लगभग 6 मीटर ऊँचा धातु का विशाल त्रिशूल स्थापित है। मान्यता है कि यह देवताओं के सामूहिक तेज से अज्ञान की शक्तियों के संहार हेतु बना। भक्त कहते हैं कि एक उंगली के स्पर्श से पूरा स्तंभ कंपित हो उठता है।

उत्तरकाशी सदियों से गंगोत्री और गौमुख जाने वाले साधकों का प्रवेश-द्वार रही है। यह घाटी मनन और निदिध्यासन के लिए उपयुक्त है। भागीरथी की निरंतर कल-कल ध्वनि मन के विक्षेप शांत करने में सहायक बनती है।

प्रमुख पवित्र धाम एवं स्थल

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर
क्षेत्र एवं भूगोल:उत्तरकाशी नगर केंद्र, भागीरथी तट
स्वरूप एवं आख्यान:स्वयंभू शिवलिंग, जो मान्यतानुसार दक्षिण की ओर हल्का झुका है
अनुष्ठान एवं उत्सव:भागीरथी जल से रुद्राभिषेक, बिल्वार्चन, महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण
आध्यात्मिक महत्त्व:जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, पाप-निवारण और मानसिक एकाग्रता
शक्ति मंदिर (महात्रिशूल)
क्षेत्र एवं भूगोल:विश्वनाथ मंदिर के ठीक सम्मुख
स्वरूप एवं आख्यान:लगभग 6 मीटर ऊँचा धातु का विशाल त्रिशूल, देवी को समर्पित
अनुष्ठान एवं उत्सव:कुमकुम लेपन, अखंड दीप प्रज्वलन, दोनों नवरात्रों में विशेष अर्चना
आध्यात्मिक महत्त्व:साहस और आंतरिक-बाह्य विघ्नों से रक्षा
मणिकर्णिका घाट
क्षेत्र एवं भूगोल:भागीरथी गंगा तट
स्वरूप एवं आख्यान:वाराणसी के मणिकर्णिका के नाम पर स्नान घाट
अनुष्ठान एवं उत्सव:सायंकालीन दिव्य गंगा आरती, मकर संक्रांति स्नान, पितृ तर्पण
आध्यात्मिक महत्त्व:आत्मशुद्धि, पूर्वजों की सद्गति और गंगा की प्रत्यक्ष कृपा प्राप्ति
कण्डार देवता मंदिर
क्षेत्र एवं भूगोल:उत्तरकाशी की उपत्यका
स्वरूप एवं आख्यान:क्षेत्रपाल देवता जो संपूर्ण घाटी और हिमालयी शिखरों की रक्षा करते हैं
अनुष्ठान एवं उत्सव:पारंपरिक देव डोली नृत्य और स्थानीय लोकोत्सव
आध्यात्मिक महत्त्व:उच्च हिमालयी यात्राओं में सुरक्षा और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा
कैलाश एवं उदासीन आश्रम
क्षेत्र एवं भूगोल:वरुणा-भागीरथी संगम क्षेत्र
स्वरूप एवं आख्यान:अद्वैत वेदान्त और उच्च संन्यास परम्परा की ऐतिहासिक पीठ
अनुष्ठान एवं उत्सव:नित्य वेदान्त प्रवचन, उपनिषद् स्वाध्याय और प्रातःकालीन ध्यान
आध्यात्मिक महत्त्व:ज्ञान-प्राप्ति, वैराग्य की सुदृढ़ता और ब्रह्मविद्या का साक्षात्कार

संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परंपरा

परंपरा आठवीं शताब्दी के जगद्गुरु आदि शंकराचार्य को इस क्षेत्र के हिमालयी तीर्थों से जोड़ती है। विश्वनाथ मंदिर का वर्तमान स्वरूप सन् 1857 में टिहरी गढ़वाल की महारानी खनेती द्वारा बनवाया गया माना जाता है, जिससे यहाँ पूजा अविच्छिन्न रही।

आधुनिक काल में उत्तरकाशी वेदान्त-साधना की भूमि के रूप में जानी जाती है। स्वामी चिन्मयानंद जी के गुरु स्वामी तपोवन महाराज ने वर्षों तक हिमालय में मौन और अध्ययन में जीवन बिताया। भ्रमणशील साधु और साधक भागीरथी के तट पर ध्यान की परंपरा बनाए रखते हैं।

पावन श्लोक एवं ध्यान

श्रीविश्वनाथाष्टकम् (श्लोक १)

गङ्गातरङ्गरमणीयजटाकलापं गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम् ।

नारायणप्रियमनङ्गमदापहारं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥

भावार्थ: "जिनके सुंदर जटाजूट में माँ गंगा की दिव्य तरंगें क्रीड़ा करती हैं, जिनके वाम भाग में नित्य भगवती गौरी सुशोभित हैं, जो भगवान श्रीहरि नारायण के अत्यंत प्रिय हैं और जिन्होंने कामदेव के अभिमान को भस्म कर दिया—उन काशी के अधिपति देवाधिदेव श्री विश्वनाथ की हम अनन्य भाव से शरण ग्रहण करते हैं।"

क्या आप जानते हैं?

विश्वनाथ मंदिर के सम्मुख शक्ति मंदिर का त्रिशूल लगभग 6 मीटर ऊँचा है, और भक्त कहते हैं कि एक उंगली के स्पर्श से वह कंपित होता है।

वाराणसी की ही भांति उत्तरकाशी भी वरुणा और असि नामक दो पावन धाराओं से घिरी है, जो भागीरथी गंगा में मिलती हैं।

गर्भगृह का स्वयंभू शिवलिंग दक्षिण की ओर हल्का झुका माना जाता है, जिसे भक्त तीर्थयात्री पर प्रभु की करुण दृष्टि का प्रतीक मानते हैं।

स्वामी चिन्मयानंद जी के गुरु स्वामी तपोवन महाराज ने वर्षों तक हिमालय में निवास और उपदेश किया, और अपने हिमालय भ्रमण पर 'हिमगिरि विहार' ग्रंथ के लिए जाने जाते हैं।

उत्तरकाशी को ‘सौम्य काशी’ कहा जाता है, जो वाराणसी का हिमालयी प्रतिरूप है।

Shiva की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Shiva

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