द्वादशज्योतिर्लिङ्गानि
प्राकट्यकथा, स्थानानि, पावनदर्शनमाहात्म्यञ्च
द्वादशज्योतिर्लिङ्गानि भगवतः शिवस्य स्वयम्भूतानि अनन्ततेजोमयानि रूपाणि सन्ति, यानि हिमालयादारभ्य सेतुपर्यन्तं भक्तान् मोक्षं प्रापयन्ति।
द्वादश ज्योतिर्लिंगों का पावन उद्गम
सनातन धर्म में ज्योतिर्लिंग देवाधिदेव महादेव के अनंत, स्वयंभू प्रकाश-स्तंभ का पावन स्वरूप हैं। मानव निर्मित मूर्तियों से भिन्न, बारह ज्योतिर्लिंग वे पावन तीर्थ हैं जहाँ भगवान शिव स्वयं दिव्य प्रकाश के रूप में प्रकट हुए।
शिव पुराण के अनुसार, जब सृष्टि के प्रारंभ में अहंकार और भ्रम उत्पन्न हुआ, तब भगवान शिव ने समस्त लोकों को आलोकित करने वाले एक विशाल, तेजोमय स्तंभ के रूप में दर्शन दिए। इस परम सत्य का साक्षात्कार होने पर देवों ने शिव की स्तुति की। भक्तों के कल्याण और आध्यात्मिक मुक्ति हेतु भगवान शिव भारत भूमि पर बारह पावन स्थानों में सदा निवास करते हैं।
१२ पावन ज्योतिर्लिंग: भौगोलिक स्थान व माहात्म्य
भक्ति इतिहास व संत परंपरा
द्वादश ज्योतिर्लिंग सहस्राब्दियों से भारत की आध्यात्मिक चेतना के केंद्र रहे हैं:
- •आदि शंकराचार्य जी ने संपूर्ण भारत की पदयात्रा कर द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र की रचना की।
- •महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, महाकालेश्वर, घृष्णेश्वर और वैद्यनाथ धामों का भव्य पुनर्निर्माण कराया।
- •संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, बसवेश्वर और श्री चैतन्य महाप्रभु जैसे महान संतों ने इन तीर्थों की वंदना की।
पावन द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वारणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
ज्ञातव्य-विशेषः
The word Jyotirlinga joins jyoti, light, with linga, sign. The Shiva Purana presents it as Shiva's form as an endless pillar of light.
Somnath at Prabhas Patan in Gujarat is traditionally counted as the first Jyotirlinga, and the stotra begins with it.
Mahakaleshwar in Ujjain is the only south-facing Jyotirlinga, and its dawn Bhasma Aarti is well known.
Kedarnath stands at about 3,583 metres and is the northernmost Jyotirlinga. Rameswaram is the southernmost.
Ahilyabai Holkar (1725 to 1795) re-installed Kashi Vishwanath in 1780 and supported work at several other Shiva shrines.
