कर्म योग
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
निष्काम कर्म का मार्ग
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
'कर्म' और 'योग' से बना; गीता के चार मार्गों में से एक, जिसमें व्यक्ति कर्म के फल के प्रति आसक्ति के बिना अपने कर्तव्य का पालन करता है।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
कृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि युद्ध में कर्म योग उनका सबसे सुलभ मार्ग है — कर्म स्वयं बंधन नहीं है, केवल उसके परिणामों की लालसा बंधन है।