निर्गुण भक्ति
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
निराकार-निर्गुण ईश्वर की भक्ति
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'निर्गुण' (गुण-रहित, निराकार) तथा 'भक्ति' (भक्ति) से निर्मित।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
कबीर की केंद्रीय धार्मिक मान्यता — मूर्ति, शास्त्र, मंदिर या मस्जिद से परे निराकार, नामरहित ईश्वर की भक्ति, जो उनकी परंपरा को सगुण भक्ति (कृष्ण या राम जैसे साकार ईश्वर की भक्ति) से अलग करती है।