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Embroidered artwork for चेन्नमल्लिकार्जुन का वैराग्य-वचन: Embroidered silver ishtalinga, a seated Nandi bull and bilva leaves beside a stone shrine

चेन्नमल्लिकार्जुन का वैराग्य-वचन

चेन्नमल्लिकार्जुन का वैराग्य-वचन

यह एक भक्ति-कविता (वचन) है, जिसमें संत अल्लम प्रभु कहते हैं कि जिसने भगवान चेन्नमल्लिकार्जुन (शिव) को जान लिया, उसे सांसारिक सुखों, इच्छाओं और मोह की कोई आवश्यकता नहीं रहती।

श्लोक

बेसरवूडिय नागुलुगळ तंतु वादरुदेंडु बिडुवेने? हूडिय कुदुरेन नरिगे बिक्कुवेने?
Besaravudiya Nagulugala Tantu Vadarudendu Biduvene? Hudiya Kudurena Narige Bikkuvene?

श्लोक 1

भोगिय भोगव नेंबुरुषन कुडिवेने? मदनन मेलैद केळुवेने?
Bhogiya Bhogava Nemburushana Kudivene? Madanana Meleida Keluvene?

श्लोक 2

चन्नमल्लिकार्जुनरायल बेरे केंडु उरयुलु बेय्यालै बीडुवेने?
Chennamallikarjunarayala Bere Kendu Urayulu Beyyalai Beeduvene?

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

सोमवार एवं प्रदोष काल

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति

पृष्ठभूमि

यह वचन बारहवीं शताब्दी के कर्नाटक में चले शरणा आंदोलन से जुड़ा है, जो लिंगायत परंपरा का हिस्सा है। 'वचन' का अर्थ है 'कहा हुआ' — ये सरल कन्नड़ भाषा में रचे गए छोटे भक्ति-पद हैं, जिन्हें संत-कवि अपने अनुभव से कहते थे। अल्लम प्रभु इस परंपरा के सबसे प्रमुख संतों में से एक हैं। इन वचनों को आज भी लिंगायत समुदाय की पूजा और सत्संगों में पढ़ा और गाया जाता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Akka Mahadevi

क्या आप जानते हैं?

रचयिता और परंपरा

यह वचन 12वीं शताब्दी के महान कन्नड़ कवि-संत अल्लमा प्रभु का है। 'वचन' का अर्थ है 'कहा हुआ' — यह कर्नाटक के वीरशैव (लिंगायत) आंदोलन की एक मुक्त-छंद काव्य-शैली है, जो सामाजिक समानता और प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव पर जोर देती है।

प्रतीकात्मक कल्पना

तुलसी (बेसरवूडिय) पवित्र है, पर उस पर सर्प (नागुलुगळ) भी होते हैं। कवि पूछते हैं कि क्या वह सर्पों को रस्सी से बाँधेंगे? यह उन निरर्थक कर्मकांडों और बंधनों का प्रतीक है जिन्हें एक साधक को पूरी तरह त्याग देना चाहिए।

इंद्रिय-सुख का त्याग

'भोगिय भोगव' (भोगने वाले का भोग) और 'मदनन' (कामदेव) का उल्लेख करते हुए, अल्लमा प्रभु स्पष्ट करते हैं कि वे सांसारिक सुखों और काम-वासना के जाल में नहीं फँसेंगे। यह आत्म-संयम और वैराग्य की चरम अभिव्यक्ति है, जो उनके अद्वैत (अद्वितीय) दर्शन का केंद्र है।

अंकित और अंतिम प्रश्न

प्रत्येक वचन के अंत में 'चन्नमल्लिकार्जुन' (सुंदर मल्लिकार्जुन) नाम आता है, जो उनका आध्यात्मिक हस्ताक्षर (अंकित) है। यहाँ 'बेरे केंडु' (दूसरे को जानकर) का अर्थ है — बाहरी देवता को नहीं, बल्कि अपने भीतर के सच्चे, निराकार परमात्मा को पहचानकर, क्या वह फिर संसार के जाल में बंधेंगे? यह प्रश्न ही उनकी मुक्ति की घोषणा है।

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