गुरु-लिंग-जंगम का त्रिविध स्वरूप
यह पाठ लिंगायत परंपरा में गुरु, लिंग और जंगम के तीन रूपों तथा उनके आपसी संबंधों का संक्षिप्त वर्णन करता है। यह शिवभक्तों को उनकी आध्यात्मिक साधना में मार्गदर्शन देने के लिए है।
श्लोक
पहले गुरु से लिंग का वेध (दीक्षा) प्राप्त होता है, फिर उस लिंग को शरीर में स्थापित करना चाहिए।
श्लोक 1
पहले अंग (स्वयं) को स्थापित करके, फिर जंगम (चलते-फिरते सद्गुरु) की आठ प्रकार से पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 2
इष्टलिंग, प्राणलिंग और भावलिंग – इस प्रकार लिंग तीन प्रकार के होते हैं।
श्लोक 3
दीक्षा गुरु है, शिक्षा लिंग है, और कृपादृष्टि जंगम है।
श्लोक 4
इस प्रकार त्रिविध (गुरु, लिंग, जंगम) को समझकर, कूडलचंगमदेव प्रभु (शिव) में समाहित होकर, वे उनमें लीन हो गए।
श्लोक 5
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
सोमवार एवं प्रदोष काल
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला
बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प
- आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति
पृष्ठभूमि
यह पाठ वीरशैव लिंगायत परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंश है, जो 12वीं शताब्दी के कर्नाटक के संत बसवेश्वर की शिक्षाओं से जुड़ा है। इसका प्रयोग प्रायः गुरु द्वारा शिष्य को दीक्षा के समय या ध्यान-पूजा में गुरु, लिंग और जंगम की एकता पर चिंतन करने के लिए किया जाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Channabasavanna
क्या आप जानते हैं?
तीन प्रकार के लिंग
इस पाठ में तीन प्रकार के लिंग बताए गए हैं— इष्टलिंग (पूजा का चिह्न), प्राणलिंग (प्राणों में बसने वाला) और भावलिंग (भावना का लिंग)। यह वर्गीकरण लिंगायत परंपरा की गहरी आध्यात्मिक समझ को दर्शाता है।
गुरु, लिंग और जंगम का त्रिविध संबंध
दीक्षा को गुरु माना गया है, शिक्षा को लिंग और कटाक्ष (कृपादृष्टि) को जंगम कहा गया है। यह तीनों मिलकर साधक के जीवन में आध्यात्मिक मार्गदर्शन का पूरा ढाँचा बनाते हैं।
जंगम की आठ प्रकार से पूजा
पाठ में कहा गया है कि अंगपूर्वक (अर्थात अंगों से युक्त) जंगम की आठ प्रकार से आराधना करनी चाहिए। यह भक्ति की समृद्ध और विस्तृत परंपरा को इंगित करता है।
कूडलचंगमदेवप्रभु का संदर्भ
यह संत बसवेश्वर द्वारा प्रयुक्त एक प्रसिद्ध नाम है, जो शिव को कूडलसंगम (नदियों के संगम) के स्वामी के रूप में संबोधित करता है। इस पाठ में उसी प्रभु में लीन होने की बात कही गई है।
गुरु, लिंग और जंगम की त्रिविधता का मर्म
भक्त को इन तीनों को एक ही तत्व का विभिन्न रूप मानकर समझना चाहिए। यह शिक्षा वीरशैव परंपरा की एकात्म दृष्टि को उजागर करती है, जहाँ गुरु, लिंग और जंगम में भेद नहीं किया जाता।
Shiva
लिंगायत धर्म से और
संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
