Bharat Devotion
Embroidered artwork for देह ही शिवालय – बसवन्ना का वचन: Embroidered silver ishtalinga, a seated Nandi bull and bilva leaves beside a stone shrine

देह ही शिवालय – बसवन्ना का वचन

देह ही शिवालय – बसवन्ना का वचन

यह एक प्रसिद्ध भक्ति कविता (वचन) है जिसमें भक्त अपने शरीर के अंगों को भगवान शिव के मंदिर के विभिन्न भागों के रूप में वर्णित करता है और अंत में प्रश्न करता है कि क्या यह मानव-निर्मित मंदिर स्थायी है या नाशवान।

श्लोक

उल्लावरु शिवालयाय माडुवरु, नानॆन माडुवॆ बडवनय्या ? कालॆ कंब, दॆहवॆ गर्भगृह, शिरवॆ हॊन्न कलशवय्या. कूडलसंगमदेवा – कॆट्टुरु निंतुदु, स्थिरावॆ ? अळियदॆ इंतुदु.
Ullavaru Shivalayaya Maduvaru, Nanena Maduve Badavanayya? Kaale Kamba, Dehave Garbhagruha, Shirave Honna Kalashavayya. Koodalasangamadeva – Ketturu Nintudu, Sthirave? Aliyade Intudu.

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह वचन 12वीं शताब्दी के कर्नाटक के लिंगायत संत बसवन्ना द्वारा रचित वचन साहित्य का हिस्सा है। वचन साहित्य कन्नड़ भाषा की एक भक्ति काव्य परंपरा है, जिसमें सरल और सीधी भाषा में ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण व्यक्त किया जाता है। इस वचन का प्रयोग अक्सर व्यक्तिगत ध्यान या लिंगायत समुदाय की सभाओं में किया जाता है। बसवन्ना अपने वचनों में भगवान शिव को 'कूडलसंगमदेव' (नदियों के संगम के स्वामी) के नाम से संबोधित करते हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Basavanna · मध्यकालीन लिंगायत दार्शनिक-संत · 12वीं शताब्दी, कर्नाटक

12वीं शताब्दी के कन्नड़ दार्शनिक, कवि, एवं समाज सुधारक, जिन्होंने जातिगत पदानुक्रम एवं कर्मकांड को नकारते हुए इष्टलिंग भक्ति एवं श्रम को पूजा (कायकावे कैलास) मानने वाले लिंगायत (वीरशैव) आंदोलन की स्थापना की। उन्होंने आध्यात्मिक एवं सामाजिक चर्चा हेतु एक प्रारंभिक सार्वजनिक मंच, अनुभव मंटप, की भी स्थापना की।

क्या आप जानते हैं?

रचनाकार

यह वचन 12वीं सदी के महान संत एवं लिंगायत आंदोलन के प्रणेता बसवन्ना (1131–1167) का है। उन्होंने कन्नड़ भाषा में सरल, गद्यात्मक 'वचन' शैली में भक्ति रचनाएँ लिखीं, जो जाति-पाँति और बाह्य आडंबरों का विरोध करती हैं।

अर्थ

इस वचन में शरीर को ही शिव का मंदिर बताया गया है—पैर खंभे, शरीर गर्भगृह और सिर सोने का कलश। यह बाहरी पूजा-पाठ की अपेक्षा आंतरिक भक्ति और आत्म-साक्षात्कार पर जोर देता है।

देवता का संबोधन

बसवन्ना अपने इष्टदेव 'कूडलसंगमदेव' (कूडलसंगम के शिव) को संबोधित करते हैं। कूडलसंगम कर्नाटक में कृष्णा और मलप्रभा नदियों का संगम स्थल है, जहाँ उन्होंने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे।

प्रश्न और उत्तर का भाव

वचन के अंत में पूछा गया है—'क्या यह मंदिर स्थिर रहेगा?' और उत्तर मिलता है—'बिना नष्ट हुए ऐसे ही रहेगा।' यह शरीर की नश्वरता और आत्मा की अमरता के बीच के द्वंद्व को दर्शाता है।

वचन साहित्य की विशेषता

यह रचना 'वचन' नामक काव्य-शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो मुक्त छंद में लिखी जाती है और इसमें संवादात्मक शैली, गहन आध्यात्मिकता तथा सामाजिक समानता का संदेश निहित होता है।

Basavanna की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Basavanna

Basavanna के सभी पाठ देखें →

लिंगायत धर्म से और

संबंधित शिक्षाएं

एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित