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Embroidered artwork for इवनारव — ये हमारे अपने हैं: Embroidered silver ishtalinga, a seated Nandi bull and bilva leaves beside a stone shrine

इवनारव — ये हमारे अपने हैं

इवनारव — ये हमारे अपने हैं

इस वचन में बसवण्णा प्रार्थना करते हैं कि उन्हें अजनबी नहीं, कूडलसंगमदेव के अपने घर का पुत्र कहा जाए।

श्लोक

इवनारव, इवनारव, इवनारवनॆंदॆनिसदिरय्या.
Ivanaarava, ivanaarava, ivanaaravanendenisadirayyaa.

श्लोक 1

इव नम्मव, इव नम्मव, इव नम्मवनॆंदॆनिसय्या.
Iva nammava, iva nammava, iva nammavanendenisayyaa.

श्लोक 2

कूडलसंगमदेवा निम्म मनॆय मगनॆंदॆनिसय्या.
Koodalasangamadevaa, nimma maneya maganendenisayyaa.

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह वचन 12वीं शताब्दी के कन्नड़ भक्ति संत बसवण्णा (बसवेश्वर) की रचना के रूप में प्रसिद्ध है। यह लिंगायत (वीरशैव) परंपरा के वचन साहित्य का हिस्सा है, जिसमें सरल बोलचाल की कन्नड़ में ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण व्यक्त किया जाता है। 'कूडलसंगमदेव' उनका अंकित नाम है, जो शिव को संबोधित है। वचन संचय के संग्रह में यह बसवण्णा के नाम से समग्र वचन संपुट 1 में वचन संख्या 62 के रूप में मिलता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Basavanna · मध्यकालीन लिंगायत दार्शनिक-संत · 12वीं शताब्दी, कर्नाटक

12वीं शताब्दी के कन्नड़ दार्शनिक, कवि, एवं समाज सुधारक, जिन्होंने जातिगत पदानुक्रम एवं कर्मकांड को नकारते हुए इष्टलिंग भक्ति एवं श्रम को पूजा (कायकावे कैलास) मानने वाले लिंगायत (वीरशैव) आंदोलन की स्थापना की। उन्होंने आध्यात्मिक एवं सामाजिक चर्चा हेतु एक प्रारंभिक सार्वजनिक मंच, अनुभव मंटप, की भी स्थापना की।

क्या आप जानते हैं?

परंपरा

यह वचन है, यानी सरल कन्नड़ में 12वीं सदी के लिंगायत संतों की रची छोटी मुक्त-छंद भक्ति कविता। वचन खोखले कर्मकांड को नकारते हैं और ईश्वर के प्रत्यक्ष, व्यक्तिगत अनुभव पर बल देते हैं।

प्रार्थना का स्वरूप

पहली दो पंक्तियाँ एक-दूसरे का प्रतिबिंब हैं। वक्ता 'इवनारव' (यह किसका है, कोई अजनबी) कहलाना नहीं चाहता, बल्कि 'इव नम्मव' (यह हमारा अपना है) कहलाना चाहता है। अंतिम पंक्ति सीधे यह इच्छा रखती है कि वह प्रभु के अपने घर का पुत्र कहलाए।

पावन स्थल

कूडलसंगम कर्नाटक में कृष्णा और मलप्रभा नदियों का संगम है, जो एक प्रमुख तीर्थ है और लिंगायत आंदोलन के संस्थापक बसवण्णा से गहराई से जुड़ा है। माना जाता है कि वे वहीं देवता में लीन हुए।

स्रोत

वचन संचय संग्रह में यह वचन बसवण्णा के नाम से समग्र वचन संपुट 1, वचन संख्या 62 के रूप में सूचीबद्ध है। इस पृष्ठ की कन्नड़ पंक्तियाँ उसी पाठ के अनुसार हैं।

विनम्र अभिलाषा

वचन में धन या सिद्धि की कोई माँग नहीं है, केवल अपनेपन की चाह है, जो हर भक्त को परिवार का सदस्य मानने के लिंगायत आदर्श से मेल खाती है।

Basavanna की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Basavanna

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