बसवण्ण का वचन
आंतरिक और बाह्य शुद्धि का मार्ग
यह वचन बसवण्ण द्वारा रचित है, जिसमें सदाचार के सात नियमों का वर्णन है: न मारना, न चोरी करना, न झूठ बोलना, न क्रोध करना, दूसरों से घृणा न करना, स्वयं की प्रशंसा न करना, और दूसरों की निंदा न करना। इसे आंतरिक और बाह्य शुद्धि का साधन बताया गया है।
श्लोक
चोरी मत करो, हत्या मत करो, झूठ मत बोलो, क्रोध मत करो, दूसरों से घृणा मत करो, अपनी प्रशंसा मत करो, और सामने वाले की निंदा मत करो। यही आंतरिक शुद्धि है, यही बाह्य शुद्धि है, यही हमारे कूडलसंगमदेव को प्रसन्न करने का मार्ग है।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह वचन 12वीं शताब्दी के लिंगायत संत बसवण्ण द्वारा रचित वचन साहित्य का हिस्सा है। इसमें सात सदाचार के नियमों के माध्यम से आंतरिक और बाह्य शुद्धि पर जोर दिया गया है। इसे भक्ति और नैतिक जीवन के मार्गदर्शन के रूप में पढ़ा जाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Basavanna · मध्यकालीन लिंगायत दार्शनिक-संत · 12वीं शताब्दी, कर्नाटक
12वीं शताब्दी के कन्नड़ दार्शनिक, कवि, एवं समाज सुधारक, जिन्होंने जातिगत पदानुक्रम एवं कर्मकांड को नकारते हुए इष्टलिंग भक्ति एवं श्रम को पूजा (कायकावे कैलास) मानने वाले लिंगायत (वीरशैव) आंदोलन की स्थापना की। उन्होंने आध्यात्मिक एवं सामाजिक चर्चा हेतु एक प्रारंभिक सार्वजनिक मंच, अनुभव मंटप, की भी स्थापना की।
क्या आप जानते हैं?
रचनाकार
यह वचन 12वीं सदी के कन्नड़ कवि-संत बसवेश्वर (बसवन्ना) का है, जो लिंगायत परंपरा के संस्थापकों में से एक हैं। उन्होंने सामाजिक भेदभाव और कर्मकांड के विरुद्ध सरल, सीधी भाषा में नैतिक उपदेश दिए।
वचन साहित्य
यह 'वचन' नामक गद्य-पद्य मिश्रित शैली में लिखा गया है, जो कन्नड़ भक्ति साहित्य की अनूठी विधा है। वचनों में संत अपने अनुभव और शिव के प्रति समर्पण को अत्यंत सहज और लोकभाषा में व्यक्त करते थे।
नैतिक सूत्र
इस वचन में सात स्पष्ट निषेधात्मक आदेश दिए गए हैं—चोरी न करो, हत्या न करो, झूठ न बोलो, क्रोध न करो, दूसरों से घृणा न करो, अपनी प्रशंसा न करो, और दूसरों की निंदा न करो। यह एक संपूर्ण आचार संहिता है।
आंतरिक और बाह्य शुद्धि
बसवन्ना के अनुसार, सच्ची पवित्रता बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि इन सात नैतिक नियमों के पालन से आती है। वे 'अंतरंगशुद्धि' (आंतरिक शुद्धता) और 'बहिरंगशुद्धि' (बाहरी शुद्धता) को एक ही सिक्के के दो पहलू मानते हैं।
कूडलसंगमदेव
यह शिव का एक विशेष नाम है, जिसका अर्थ है 'संगम का स्वामी'। बसवन्ना इस नाम का प्रयोग अपने इष्टदेव के लिए करते थे, और उनका मानना था कि इन सरल नियमों का पालन ही उन्हें प्रसन्न करने का एकमात्र तरीका है।
Basavanna
लिंगायत धर्म से और
संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
