Bharat Devotion
Embroidered artwork for सर्वशास्त्रमयी स्तुति – कुडलसंगमदेव को नमन: Embroidered silver ishtalinga, a seated Nandi bull and bilva leaves beside a stone shrine

सर्वशास्त्रमयी स्तुति – कुडलसंगमदेव को नमन

सर्वशास्त्रमयी स्तुति – कुडलसंगमदेव को नमन

यह एक भक्ति गीत है जो भगवान कुडलसंगमदेव की महिमा का गान करता है। इसमें बताया गया है कि प्रभु स्वयं वेद, शास्त्र, तर्क, आगम और पुराणों के रूप में विद्यमान हैं, और उनके चरणों की धूल ही सच्ची शरण है।

श्लोक

वेदमय्यतनुवदना शास्त्रमय्यतनुवदना तर्कमय्यतनुवदना आगममय्यतनुवदना पुराणमय्यतनुवदना एतन्मय्यतनुवदननाराधननाराधने तव शरणर पदधूलिय नान्तागनेनय्या कुडलसंगमदेव.
Vedamayya tanuvadana Shaastramayya tanuvadana Tarkamayya tanuvadana Aagamamayya tanuvadana Puraanamayya tanuvadana Etanmayya tanuvadananaaraadhana naaraadhane Tava sharanara padadhooliya naantaaganenayya Koodalasangamadeva

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

सोमवार एवं प्रदोष काल

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति

पृष्ठभूमि

यह स्तुति कर्नाटक की लिंगायत (वीरशैव) परंपरा से जुड़ी है, जिसमें भक्त कवियों (शरणों) ने ईश्वर की सरल और गहन स्तुति के लिए वचन साहित्य की रचना की। यह विशेष रूप से भगवान कुडलसंगमदेव (शिव के एक रूप) को समर्पित है और प्रायः व्यक्तिगत प्रार्थना या ध्यान के समय पढ़ी जाती है। इसका प्रयोग भक्त को यह स्मरण दिलाने के लिए किया जाता है कि ईश्वर सभी शास्त्रों, वेदों और तर्कों से परे होते हुए भी उनमें व्याप्त हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Basavanna · मध्यकालीन लिंगायत दार्शनिक-संत · 12वीं शताब्दी, कर्नाटक

12वीं शताब्दी के कन्नड़ दार्शनिक, कवि, एवं समाज सुधारक, जिन्होंने जातिगत पदानुक्रम एवं कर्मकांड को नकारते हुए इष्टलिंग भक्ति एवं श्रम को पूजा (कायकावे कैलास) मानने वाले लिंगायत (वीरशैव) आंदोलन की स्थापना की। उन्होंने आध्यात्मिक एवं सामाजिक चर्चा हेतु एक प्रारंभिक सार्वजनिक मंच, अनुभव मंटप, की भी स्थापना की।

क्या आप जानते हैं?

रचना का संदर्भ

यह वचन कुडलसंगम देव (शिव) को संबोधित है, जो लिंगायत परंपरा के प्रमुख संत बसवेश्वर की रचनाओं में मिलता है। 'कुडलसंगम' कर्नाटक का एक पवित्र स्थल है जहाँ कृष्णा और मलप्रभा नदियाँ मिलती हैं।

शास्त्रों का साकार रूप

इन पंक्तियों में भगवान के शरीर को वेद, शास्त्र, तर्क, आगम और पुराणों से निर्मित बताया गया है। यह दर्शाता है कि ईश्वर स्वयं ज्ञान और शास्त्रों से अभिन्न हैं।

आराधना का मर्म

कवि कहते हैं कि इन सबसे युक्त प्रभु की आराधना ही सच्ची आराधना है। यहाँ 'एतन्मय्यतनुवदन' का अर्थ है जिसका शरीर इन सबसे बना हो – ऐसे प्रभु की शरण में जाना ही मुक्ति का मार्ग है।

चरण धूल का महत्व

अंतिम पंक्ति में भगवान के चरणों की धूल को 'नान्तागनेनय्या' (अनंत अग्नि से परे) कहा गया है। यह संसार के दुखों और अज्ञान रूपी अग्नि से मुक्ति का प्रतीक है।

भाषा और शैली

यह वचन कन्नड़ और संस्कृत के मिश्रण में लिखा गया है, जो लिंगायत वचन साहित्य की विशेषता है। 'वचन' एक गद्य-पद्य मिश्रित रूप है जो सरल और प्रभावशाली होता है।

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