अजितनाथ, जो राजा जितशत्रु तथा रानी विजया को अयोध्या में जन्मे, दूसरे तीर्थंकर बने जिनका नाम बाहरी नहीं अपितु आंतरिक शत्रुओं पर विजय घोषित करता है।
यह जैन स्तुति तीर्थंकर अजितनाथ और शांतिनाथ की वंदना करती है, उनके गुणों का गान करती है और संसार-सागर पार करने के लिए उनकी सहायता माँगती है।