अजित-शांति स्तोत्र (तीर्थंकर युगल वंदना)
यह एक जैन प्रार्थना है जो दो महान तीर्थंकरों—अजितनाथ और शांतिनाथ—की वंदना करती है। इसमें भक्त उनसे संसार रूपी समुद्र को पार करने की प्रार्थना करता है।
श्लोक
मैं भक्तिपूर्वक उस जिनवर युगल को नमन करता हूँ, जो अजित और शांति स्वरूप हैं, जो संसार-सागर को पार करने के लिए नाव के समान हैं तथा भक्तों की रक्षा करने वाले हैं।
श्लोक 1
अजित जिनेंद्र, जिनवर वृषभ, अनेक गुणों के निवास, भव-सागर से तारने वाले, देवराज इंद्र द्वारा स्तुत, उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 2
शांति जिनवर वृषभ, देव, मनुष्य और असुरों द्वारा पूजित, महान भव्य, भव-सागर से तारने वाले, देवराज इंद्र द्वारा स्तुत, उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 3
अजित जिनेंद्र, जिनवर वृषभ, अनेक गुणों के निवास, भव-सागर से तारने वाले, उस जिनवर वर वृषभ को मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 4
शांति जिनवर वृषभ, देव, मनुष्य और असुरों द्वारा पूजित, महान भव्य, भव-सागर से तारने वाले, उस जिनवर वर वृषभ को मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 5
अजित जिनेंद्र, जिनवर वृषभ, अनेक गुणों के निवास, भव-सागर से तारने वाले, देवश्रेष्ठ द्वारा वंदित उन्हें मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 6
शांति जिनवर वृषभ, देव, मनुष्य और असुरों द्वारा पूजित, महान भव्य, भव-सागर से तारने वाले, देवश्रेष्ठ द्वारा वंदित उन्हें मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 7
अजित जिनेंद्र, जिनवर वृषभ, अनेक गुणों के निवास, भव-सागर से तारने वाले, उस जिनवर वर वृषभ को मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 8
शांति जिनवर वृषभ, देव, मनुष्य और असुरों द्वारा पूजित, महान भव्य, भव-सागर से तारने वाले, उस जिनवर वर वृषभ को मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 9
अजित जिनेंद्र, जिनवर वृषभ, अनेक गुणों के निवास, भव-सागर से तारने वाले, उस जिनवर वर वृषभ को मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 10
शांति जिनवर वृषभ, देव, मनुष्य और असुरों द्वारा पूजित, महान भव्य, भव-सागर से तारने वाले, उस जिनवर वर वृषभ को मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 11
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र जैन परंपरा का एक भक्ति-पाठ है, जिसमें चौबीस तीर्थंकरों में से दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ और सोलहवें तीर्थंकर शांतिनाथ की एक साथ स्तुति की गई है। इसे प्रायः सुबह-शाम या पूजा-अनुष्ठानों के समय श्रद्धा से गाया जाता है। यह पाठ प्राकृत भाषा (अर्धमागधी) में रचित है और जैन धर्म के सिद्धांतों—संसार-सागर से पार उतरने के लिए तीर्थंकरों की शरण—को सरल शब्दों में व्यक्त करता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Acharya Nandisena
क्या आप जानते हैं?
रचना और भाषा
यह स्तोत्र प्राकृत भाषा में रचित है, जो जैन धर्म के प्राचीन ग्रंथों की भाषा है। संस्कृत के बजाय प्राकृत का प्रयोग इसकी विशेषता है, क्योंकि जैन तीर्थंकरों के उपदेश प्राकृत में ही प्रचारित हुए थे।
प्रमुख तीर्थंकर
इस स्तोत्र में दो तीर्थंकरों की वंदना है – अजितनाथ (प्रथम तीर्थंकर) और शांतिनाथ (सोलहवें तीर्थंकर)। 'अजिय' और 'संति' शब्द क्रमशः उन्हीं के नाम के प्राकृत रूप हैं।
संरचना और दोहराव
प्रत्येक दो श्लोक एक युगल बनाते हैं – पहला अजितनाथ को और दूसरा शांतिनाथ को समर्पित है। यह क्रम 11 श्लोकों तक चलता है, जिसमें 'भव-सायर-तारण' (संसार-सागर से पार करने वाले) जैसे शब्द बार-बार आते हैं।
भावार्थ और श्रद्धा
'भव-सायर-तारण' का अर्थ है 'संसार रूपी समुद्र से पार उतारने वाला'। यहाँ भक्त तीर्थंकरों से उसी प्रकार सहायता माँगता है जैसे एक नाविक समुद्र पार कराता है। 'नमो थुअ-सुरेत्ते' और 'नमामि जिणवर-वर-वृसभं' जैसे पद विनम्र श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं।
जैन परंपरा में महत्व
यह स्तोत्र प्रायः पूजा या प्रार्थना के समय गाया जाता है। 'जिणवर' शब्द 'जिन' (विजेता) और 'वर' (श्रेष्ठ) का संयोग है, जो तीर्थंकरों के विशेषण के रूप में प्रचलित है। 'वृसभ' (वृषभ) अजितनाथ का एक विशेषण है, जो उन्हें प्रथम तीर्थंकर के रूप में चिह्नित करता है।
जैन धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
