पतंजलि योगसूत्र – साधनापाद
क्लेश और अष्टांग योग
यह योगसूत्र का एक खंड है जो मन की अशुद्धियों (क्लेशों) और उन्हें दूर करने के लिए अष्टांग योग के आठ अंगों की व्याख्या करता है।
श्लोक
तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान—ये तीनों ही क्रियायोग हैं।
श्लोक 1
यह क्रियायोग समाधि की भावना के लिए और क्लेशों को तनु (क्षीण) करने के लिए है।
श्लोक 2
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—ये पाँचों क्लेश कहे जाते हैं।
श्लोक 3
प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार अवस्थाओं वाले शेष क्लेशों का क्षेत्र अविद्या ही है।
श्लोक 4
जो अनित्य है उसमें नित्य, जो अशुचि है उसमें शुचि, जो दुःख है उसमें सुख और जो अनात्म है उसमें आत्म-रूप में प्रतीत होना ही अविद्या है।
श्लोक 5
द्रष्टा की दर्शन-शक्ति और दर्शन के विषयों में जैसे एक ही रूप हो—यह समानता ही अस्मिता है।
श्लोक 6
सुख के साथ अनुगत रहने वाला आसक्ति-भाव राग है।
श्लोक 7
दुःख के साथ अनुगत रहने वाला वैर-भाव द्वेष है।
श्लोक 8
अपनी ही धारा में बहने वाला, विद्वान में भी उसी रूप में दृढ़ होने वाला भय—यह अभिनिवेश है।
श्लोक 9
वे सूक्ष्म क्लेश, अपने कारण में लय होकर, त्यागे जाने योग्य होते हैं।
श्लोक 10
उन क्लेशों की वृत्तियाँ ध्यान के द्वारा त्यागने के योग्य होती हैं।
श्लोक 11
क्लेशों के मूल से उत्पन्न होने वाला कर्माशय दृष्ट (वर्तमान) और अदृष्ट (आगामी) जन्मों में भोगा जाता है।
श्लोक 12
मूल क्लेशों के विद्यमान रहते हुए उस कर्म का विपाक जाति, आयु और भोग के रूप में प्रकट होता है।
श्लोक 13
वे जाति, आयु और भोग पुण्य-अपुण्य के कारणों से सुख और दुःख रूप फल देते हैं।
श्लोक 14
परिणाम, ताप और संस्कारों के कारण उत्पन्न दुःखों तथा गुणों की परस्पर विरोधी वृत्तियों के कारण विवेकी पुरुष के लिए सब कुछ दुःख ही है।
श्लोक 15
जो दुःख अभी उत्पन्न नहीं हुआ है, वह त्यागे जाने के योग्य है।
श्लोक 16
द्रष्टा और दृश्य का संयोग ही उस त्याज्य दुःख का कारण है।
श्लोक 17
प्रकाश, क्रिया और स्थिति से युक्त, भूत और इन्द्रियों के रूप में व्याप्त, भोग और अपवर्ग (मोक्ष) के अर्थवाला दृश्य है।
श्लोक 18
विशेष, अविशेष, लिङ्गमात्र और अलिङ्ग—ये गुणों के चार पर्व (अवस्थाएँ) हैं।
श्लोक 19
द्रष्टा केवल दर्शन-शक्ति रूप है; वह शुद्ध होते हुए भी प्रत्ययों का अनुसरण करता हुआ प्रतीत होता है।
श्लोक 20
उस दृश्य का आत्मा (स्वरूप) केवल द्रष्टा के अर्थ के लिए ही है।
श्लोक 21
कृतार्थ (जिसका प्रयोजन सिद्ध हो गया) पुरुष के लिए दृश्य नष्ट-सा प्रतीत होता है, पर दूसरों के लिए साधारण होने से वह नष्ट नहीं होता।
श्लोक 22
स्व (अपनी) और स्वामी (अपने अधीश्वर) दोनों की शक्तियों के स्वरूप की उपलब्धि का हेतु संयोग है।
श्लोक 23
उस संयोग का कारण अविद्या है।
श्लोक 24
उस अविद्या के अभाव से संयोग का अभाव हो जाना ही हान (मोक्ष) है—यही द्रष्टा का कैवल्य है।
श्लोक 25
बिना विघ्न-विच्छेद के रहने वाली विवेकख्याति ही मोक्ष का उपाय है।
श्लोक 26
उस विवेकख्याति की सात धाराओं से परिपूर्ण अन्तिम भूमि ही प्रज्ञा है।
श्लोक 27
योग के अंगों के अनुष्ठान से अशुद्धि क्षीण होने पर, विवेकख्याति के प्राप्त होने तक, ज्ञान की दीप्ति प्रज्वलित होती रहती है।
श्लोक 28
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि — ये आठ अंग हैं।
श्लोक 29
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — ये यम हैं।
श्लोक 30
ये यम जाति, देश, काल और समय से अवच्छिन्न नहीं हैं, सार्वभौमिक हैं और महाव्रत हैं।
श्लोक 31
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान — ये नियम हैं।
श्लोक 32
वितर्कों (बुरे विचारों) की बाधा होने पर उनके विपरीत भाव का चिंतन करना चाहिए।
श्लोक 33
हिंसा आदि वितर्क चाहे स्वयं किए जाएँ, कराए जाएँ या अनुमोदित किए जाएँ, और वे लोभ, क्रोध, मोह से पूर्वक हों, मृदु, मध्यम या अधिमात्रा में हों, और उनका फल दुःख और अज्ञान ही है — इस प्रकार प्रतिपक्ष भावना करनी चाहिए।
श्लोक 34
अहिंसा की प्रतिष्ठा होने पर उसके सन्निध में सब वैर का त्याग हो जाता है।
श्लोक 35
सत्य की प्रतिष्ठा होने पर क्रिया और फल का आश्रयत्व प्राप्त होता है।
श्लोक 36
अस्तेय की प्रतिष्ठा होने पर सब रत्ण उपस्थान हो जाता है।
श्लोक 37
बरह्मचर्य क प्रतिष्ठा स वीय्र क लाभ होता है।
श्लोक 38
अपरिग्रह की स्थिरता में जन्म के कैसे और क्यों का संबोध (ज्ञान) होता है।
श्लोक 39
शौच से अपने शरीर में जुगुप्सा होती है और दूसरों से असंसर्ग होता है।
श्लोक 40
और (शौच से) सत्त्वशुद्धि, सौमनस्य, एकाग्रता, इंद्रियों का वश होना और आत्मदर्शन की योग्यता भी प्राप्त होती है।
श्लोक 41
संतोष से अनुपम सुख का लाभ होता है।
श्लोक 42
तप से अशुद्धि के क्षय होने पर काया और इंद्रियों की सिद्धि होती है।
श्लोक 43
स्वाध्याय से इष्ट देवता क साथ संपरयोग (सानिध्य) होता ह।
श्लोक 44
ईश्वरप्रणिधान से समाधि की सिद्धि होती है।
श्लोक 45
आसन स्थिर और सुखद होना चाहिए।
श्लोक 46
वह (आसन) प्रयत्न के शैथिल्य और अनंत पर समापत्ति से सिद्ध होता है।
श्लोक 47
तब (आसन क सिद्ध हन पर) दवंदवों (शीत-उष्ण आदि) से अभिघात नहीं होता।
श्लोक 48
उस (आसन) के स्थिर होने पर श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद होना प्राणायाम है।
श्लोक 49
वह (प्राणायाम) बाह्य, आभ्यंतर और स्तंभ वृत्तियों वाला होता है, तथा देश, काल और संख्याओं द्वारा परिदृष्ट होता है और दीर्घ और सूक्ष्म होता है।
श्लोक 50
चौथा (प्राणायाम) बाह्य और आभ्यंतर विषयों को अक्षेप (लांघ) करने वाला है।
श्लोक 51
तब प्रकाश के आवरण का क्षय होता है।
श्लोक 52
और मन की धारणाओं में योग्यता प्राप्त होती है।
श्लोक 53
अपने-अपने विषयों से इंद्रियों का असंप्रयोग होने पर चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना ही प्रत्याहार है।
श्लोक 54
तब इंद्रियों की परम वश्यता प्राप्त होती है।
श्लोक 55
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
सोमवार एवं प्रदोष काल
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला
बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प
- आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति
पृष्ठभूमि
यह अंश पतंजलि द्वारा रचित योगसूत्र के दूसरे अध्याय (साधनापाद) से लिया गया है। योगसूत्र भारतीय दर्शन का एक प्रमुख ग्रंथ है, जो राजयोग के मार्ग को सिखाता है। इस भाग में क्लेशों (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) और अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) का विस्तार से वर्णन है। इसका प्रयोग योग के अभ्यासियों द्वारा ध्यान और आध्यात्मिक साधना के मार्गदर्शन के लिए किया जाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Maharishi Patanjali
क्या आप जानते हैं?
क्रियायोग की परिभाषा
– पहले सूत्र (2.1) में क्रियायोग को तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान के रूप में बताया गया है। इसका उद्देश्य समाधि की भावना और क्लेशों को पतला करना है। यह योग के आरंभिक अभ्यास का आधार है।
पाँच क्लेश
– अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश – ये पाँच क्लेश हैं (2.3)। अविद्या को इनमें सबसे मूल कारण माना गया है, जो अनित्य में नित्य, अशुचि में शुचि, दुःख में सुख और अनात्म में आत्म की भ्रांति पैदा करती है (2.5)। ये क्लेश सूक्ष्म अवस्था में ध्यान से नष्ट होते हैं (2.10-11)।
अष्टांग योग
– यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि – ये आठ अंग हैं (2.29)। इनके अभ्यास से अशुद्धियाँ नष्ट होती हैं और विवेकख्याति का प्रकाश बढ़ता है (2.28)। प्रत्येक अंग के अपने विशिष्ट प्रभाव बताए गए हैं, जैसे अहिंसा से वैर का त्याग (2.35) और ब्रह्मचर्य से वीर्यलाभ (2.38)।
विवेकख्याति का महत्व
– सूत्र 2.26 के अनुसार, अविप्लवा (निरंतर) विवेकख्याति ही दुःख से मुक्ति का उपाय है। यह सात प्रकार की प्रज्ञा की चरम भूमि पर पहुँचाती है (2.27)। इसी से द्रष्टा और दृश्य के संयोग का अभाव होता है, जिसे कैवल्य कहा गया है (2.25)।
यम और नियम के प्रभाव
– यमों में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह शामिल हैं (2.30)। इनके अभ्यास से विशेष शक्तियाँ प्राप्त होती हैं: अहिंसा से शत्रुता का त्याग, सत्य से क्रियाफल की प्राप्ति, अस्तेय से सभी रत्नों का उपस्थान, ब्रह्मचर्य से वीर्यलाभ, और अपरिग्रह से जन्म-मृत्यु का ज्ञान (2.35-39)। नियमों में शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान हैं (2.32); शौच से शरीर और मन की शुद्धि होती है (2.40-41)।
Shiva
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