जीव-अजीव
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
सजीव व निर्जीव
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
'जीव' (चेतन आत्मा) और 'अजीव' (अचेतन द्रव्य) से बना; जैन तत्वमीमांसा का मूल द्वैत, जो अस्तित्व रखने वाली प्रत्येक वस्तु को इन दो श्रेणियों में विभाजित करता है।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
इस भेद को समझना मोक्ष की शुरुआत है — शुद्ध चेतन जीव को जड़ अजीव द्रव्य से पहचानना, जिसमें कर्म भी सूक्ष्म पदार्थ के रूप में सम्मिलित है।