पंच चोर
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
पाँच चोर
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
'पंच' (पाँच) और 'चोर' (चोर) से बना; कबीर द्वारा प्रयुक्त संत परंपरा का रूपक, काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार हेतु — वे पाँच आंतरिक दोष जो आत्मा से सद्गुण का धन चुरा लेते हैं।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
कबीर ने सिखाया कि ये चोर सबसे खतरनाक इसलिए हैं क्योंकि वे घर के भीतर से ही कार्य करते हैं — कोई ताला या तीर्थयात्रा उस शत्रु से रक्षा नहीं कर सकती जो पहले से ही भीतर है।