सल्लेखना
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
शरीर को क्षीण करना
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
'सत्' (सत्य) और 'लेखना' (पतला करना) से बना; मृत्यु के निकट आने पर भोजन व इच्छाओं का क्रमशः त्याग करने की अंतिम, स्वैच्छिक जैन प्रतिज्ञा।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
सल्लेखना को आत्महत्या से स्पष्ट रूप से भिन्न माना जाता है — इसे भय, क्रोध या निराशा से नहीं, बल्कि पूर्ण शांति तथा वैराग्य की स्थिति में ही स्वीकार किया जाता है।