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Embroidered artwork for जैन धर्मका पाँच महातीर्थ: शत्रुञ्जय, सम्मेद शिखर, गिरनार, पावापुरी र दिलवाड़ा: Embroidered Jain ahimsa palm with a gold wheel, white marble temples and lotuses at dawn

जैन धर्मका पाँच महातीर्थ

शत्रुञ्जय, सम्मेद शिखर, गिरनार, पावापुरी र दिलवाड़ा

जैन धर्मका पाँच महातीर्थ

शत्रुञ्जय, सम्मेद शिखर, गिरनार, पावापुरी र दिलवाड़ा

जैन धर्मका पवित्र तीर्थहरू जहाँ तीर्थङ्करहरूले मोक्ष प्राप्त गरे।

जैन दर्शन में तीर्थ का मर्म

जैन आगमों में तीर्थ का अर्थ संसार-समुद्र को पार कराने वाले पावन घाट या नौका से है। जिस भूमि पर तीर्थंकरों के कल्याणक (च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान अथवा मोक्ष) घटित होते हैं, वह भूमि सिद्धक्षेत्र और पावन तीर्थ बन जाती है।

साधक इन तीर्थों की यात्रा सांसारिक सुखों की कामना से नहीं, अपितु कर्म-निर्जरा, इंद्रिय-संयम और अपनी आत्मा के विशुद्ध अनंत चैतन्य को जागृत करने हेतु करते हैं।

जैन धर्म के पंच महातीर्थ

१
शत्रुंजय पर्वत
पालीताना, भावनगर, गुजरात
भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव)
८६० से अधिक श्वेत संगमरमर के जिनालयों वाला अद्वितीय पावन पर्वत।
२
सम्मेद शिखरजी
पारसनाथ पहाड़ी, गिरिडीह, झारखंड
२० तीर्थंकर (भगवान पार्श्वनाथ सहित)
जैन धर्म का सर्वोच्च मोक्षक्षेत्र, जहाँ २४ में से २० तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया।
३
गिरनार तीर्थ
जूनागढ़, सौराष्ट्र, गुजरात
भगवान नेमिनाथ (२२वें तीर्थंकर)
भगवान नेमिनाथ की दीक्षा, केवलज्ञान एवं निर्वाण की पावन तपोभूमि।
४
पावापुरी
नालंदा, बिहार
भगवान महावीर स्वामी (२४वें तीर्थंकर)
भगवान महावीर का पावन निर्वाण स्थल, कमल सरोवर के मध्य जल मंदिर।
५
दिलवाड़ा जिनालय
माउंट आबू, सिरोही, राजस्थान
आदिनाथ व नेमिनाथ स्वामी
संगमरमर की अप्रतिम नक्काशी से युक्त शांत, भव्य जिनालय समूह।

तीर्थ वंदना की पावन मर्यादा

जैन तीर्थ यात्रा में बाह्य एवं आंतरिक पवित्रता सर्वोपरि है:

  • •
    भक्तजन नंगे पैर पर्वत की यात्रा करते हैं तथा सूर्यास्त के पश्चात जल व अन्न का त्याग रखते हैं।
  • •
    यात्रा के दौरान सूक्ष्म जीवों की रक्षा का पूर्ण ध्यान रखा जाता है।
  • •
    संपूर्ण मार्ग में मौन, आत्म-निरीक्षण और नवकार महामंत्र का स्मरण किया जाता है।

पावन नवकार महामंत्र

तीर्थ यात्रा में निरंतर जपा जाने वाला अनादि मूल मंत्र:

णमो अरिहंताणं

णमो सिद्धाणं

णमो आयरियाणं

णमो उवज्झायाणं

णमो लोए सव्व साहूणं

एसो पंच णमुक्कारो

सव्व पावप्पणासणो

मंगलाणं च सव्वेसिं

पढमं हवइ मंगलं॥

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