माया
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
भ्रम; भरमाने वाला संसार
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'माया' (भ्रम) से; कबीर की वाणी में, धन, शरीर तथा सांसारिक संबंधों के प्रति वह मोहक किंतु अंततः भ्रामक आसक्ति जो आत्मा को काल से बाँधे रखती है।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
कबीर चेतावनी देते हैं कि माया तब सबसे खतरनाक होती है जब वह स्वयं सद्गुण का रूप धारण कर ले — अपने त्याग या धार्मिकता पर गर्व धन के लालच जितना ही बंधनकारी हो सकता है।