Bharat Devotion

अपरिग्रह

शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)

अस्वामित्व, अनासक्ति तथा संतोष

व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)

संस्कृत 'अ' (बिना) + 'परि' (चारों ओर) + 'ग्रह' (पकड़ना, संचय) से।

आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ

लोभ, अत्यधिक उपभोक्तावाद तथा आसक्ति पर अंकुश लगाकर आत्मा को चिंता से मुक्त करता है।

अपरिग्रह का उल्लेख इन लेखों में

सार्वभौमिक करुणा एवं आत्म-शुद्धि का सर्वोच्च मार्ग

अपरिग्रह महाव्रत, संतोष एवं इच्छाओं के संयम की साधना

वर्ष का सबसे पवित्र जैन पर्व — आठ से दस दिनों का उपवास, शास्त्र-अध्ययन तथा आत्म-चिंतन, जो संवत्सरी तथा सार्वभौमिक क्षमा-याचना 'मिच्छामि दुक्कडम्' में परिणत होता है।

पतंजलि के योग सूत्र अष्टांग योग प्रस्तुत करते हैं, आठ क्रमिक अंग जो शरीर को शुद्ध करते हैं, मन पर अधिकार करते हैं, तथा मुक्ति की ओर ले जाते हैं।

जैन धर्म का अपरिग्रह व्रत

चंद्रप्रभा, जो चंद्रपुरी में चंद्रमा के चिह्न के अंतर्गत जन्मे, आठवें तीर्थंकर बने जिनका नाम, चांदनी, सिखाता है कि शांति मुक्ति की नींव है।