आश्रम
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
जीवन की अवस्था; प्रयास का स्थान
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'श्रम्' (प्रयास करना) से; एक सुव्यवस्थित जीवन की चार पारंपरिक अवस्थाएँ — ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी), गृहस्थ (परिवार-प्रधान), वानप्रस्थ (सेवानिवृत्ति), तथा संन्यास (त्याग)।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
आश्रम व्यवस्था आध्यात्मिक विकास को एक ही चुनाव के बजाय आजीवन प्रगति के रूप में प्रस्तुत करती है — विवाह तथा करियर जैसे सांसारिक कर्तव्यों को भी मार्ग पर वैध कदम माना जाता है।