प्रतीत्यसमुत्पाद
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
कारणों पर आश्रित होकर उत्पन्न होना
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
'प्रतीत्य' (आश्रित होकर) और 'समुत्पाद' (उत्पन्न होना) से बना; बुद्ध की मूल अंतर्दृष्टि कि सभी घटनाएँ पारस्परिक निर्भरता में उत्पन्न होती हैं, कुछ भी स्वतंत्र रूप से विद्यमान नहीं।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
प्रतीत्यसमुत्पाद को स्पष्ट रूप से देखना धर्म को देखने के समान माना जाता है — यह स्थायी, पृथक आत्मा के भ्रम को मिटा देता है।