गृहस्थ
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
गृहस्थ अवस्था
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'गृह' (घर) से; दूसरा आश्रम, जब व्यक्ति विवाह करता है, परिवार पालता है, तथा ईमानदार कार्य द्वारा समाज का समर्थन करता है — शेष तीन जीवन-अवस्थाओं को भौतिक रूप से सहारा देने वाला स्तंभ माना जाता है।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
शास्त्रीय ग्रंथ गृहस्थ को सबसे कठिन आश्रम मानते हैं, क्योंकि गृहस्थ को उदारता के माध्यम से विद्यार्थियों, सेवानिवृत्तों, तथा संन्यासियों सभी का पालन करना होता है — सांसारिक जीवन को मात्र आत्म-भोग नहीं बल्कि सेवा माना जाता है।