Bharat Devotion

गृहस्थ

शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)

गृहस्थ अवस्था

व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)

संस्कृत 'गृह' (घर) से; दूसरा आश्रम, जब व्यक्ति विवाह करता है, परिवार पालता है, तथा ईमानदार कार्य द्वारा समाज का समर्थन करता है — शेष तीन जीवन-अवस्थाओं को भौतिक रूप से सहारा देने वाला स्तंभ माना जाता है।

आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ

शास्त्रीय ग्रंथ गृहस्थ को सबसे कठिन आश्रम मानते हैं, क्योंकि गृहस्थ को उदारता के माध्यम से विद्यार्थियों, सेवानिवृत्तों, तथा संन्यासियों सभी का पालन करना होता है — सांसारिक जीवन को मात्र आत्म-भोग नहीं बल्कि सेवा माना जाता है।

गृहस्थ का उल्लेख इन लेखों में

बुद्धि के लिए सौर आह्वान

अर्थ, धार्मिक महत्व और पवित्र परंपराएं

गुण को सार्वभौमिक जैन प्रणाम

वर्ष का सबसे पवित्र जैन पर्व — आठ से दस दिनों का उपवास, शास्त्र-अध्ययन तथा आत्म-चिंतन, जो संवत्सरी तथा सार्वभौमिक क्षमा-याचना 'मिच्छामि दुक्कडम्' में परिणत होता है।

कबीर की प्राकृतिक, सहज भक्ति

जातक कथाएँ क्यों अस्तित्व में हैं तथा प्रत्येक कथा किस प्रकार रचित है: तीन मूल प्रयोजन — ज्ञानोदय के मार्ग का चित्रण, कर्म की व्याख्या, तथा प्राचीन लोककथाओं का संरक्षण — जो एक आवर्ती त्रिखंडीय संरचना में गुंथे हैं जो वर्तमान की किसी दुविधा को पूर्वजन्म की कथा से जोड़ती है तथा पुनः वर्तमान में लौटाती है।